West Bengal Politics: TMC में बगावत, राज्यसभा उपचुनाव का ऐलान

पश्चिम बंगाल में दीदी के गढ़ में ऐसा सियासी भूचाल आया है कि ममता बनर्जी का किला ढहने की कगार पर पहुंच गया है। जी हां, तृणमूल कांग्रेस को तगड़ा झटका देते हुए जिन तीन राज्यसभा सांसदों ने बगावत का झंडा बुलंद किया था और इस्तीफा दिया था, अब उनकी खाली सीटों पर चुनाव आयोग ने महा-इलेक्शन का बिगुल फूंक दिया है! 24 जुलाई को होने जा रहे इस उपचुनाव से देश की संसद का पूरा गणित बदलने वाला है। बीजेपी एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेलने जा रही है, जिससे इतिहास रचने जा रहा है। पिछले 40 सालों में जो कोई नहीं कर पाया, वो अब होने वाला है। तो आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि कैसे ममता बनर्जी के तीन करीबियों ने दीदी का साथ छोड़ा, कैसे बीजेपी राज्यसभा में अंगद की तरह पैर जमाने जा रही है, और क्या है इस पूरे चुनावी दंगल के पीछे की कहानी!

दरअसल, कहानी की शुरुआत होती है जून के महीने से, जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद अचानक टीएमसी के भीतर असंतोष का ज्वालामुखी फट पड़ा। ममता बनर्जी की सबसे करीबी और पार्टी के बड़े चेहरों में शुमार सुखेंदु शेखर रॉय ने 8 जून को बम फोड़ दिया! उन्होंने न सिर्फ राज्यसभा से इस्तीफा दिया, बल्कि टीएमसी को भी हमेशा-हमेशा के लिए बाय-बाय कह दिया। सुखेंदु शेखर रॉय ने अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए आरोप लगाया कि पार्टी में भ्रष्टाचार चरम पर है, महिलाओं के खिलाफ हिंसा बढ़ रही है और आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना ने देश को शर्मसार किया है। उन्होंने सीधे ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी में जी-तोड़ मेहनत करने वाले सच्चे कार्यकर्ताओं को किनारे कर दिया गया है और दागी लोगों को आगे बढ़ाया जा रहा है। आपको बता दें अभी ममता बनर्जी इस झटके से संभल भी नहीं पाई थीं कि इसके ठीक दो दिन बाद, यानी 10 जून को असम की कद्दावर नेता और टीएमसी सांसद सुष्मिता देव ने भी इस्तीफा सौंप दिया। 

दरअसल, सुष्मिता देव का इतिहास दिलचस्प है। वह पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता संतोष मोहन देव की बेटी हैं, जो 2014 में कांग्रेस के टिकट पर सिलचर से सांसद रहीं और महिला कांग्रेस की अध्यक्ष भी रहीं। 2021 में वह कांग्रेस छोड़कर टीएमसी में आईं और ममता ने उन्हें राज्यसभा भेजा। लेकिन दीदी का साथ छोड़ते ही सुष्मिता देव सीधे दिल्ली पहुंचीं और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से मुलाकात की। इसके बाद कयासों का बाजार गर्म हो गया कि वो बीजेपी में शामिल होकर असम या बंगाल के रास्ते फिर से संसद पहुंच सकती हैं। विद्रोह का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। इसके बाद तीसरे सांसद प्रकाश चिक बराइक ने भी टीएमसी और राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। हालांकि प्रकाश ने ममता बनर्जी या पार्टी पर कोई सीधा आरोप तो नहीं लगाया, लेकिन उनका जाना टीएमसी की ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। इन तीनों सांसदों के इस्तीफे के बाद ममता की पार्टी की राज्यसभा में ताकत 13 से घटकर सीधे 10 पर आ गई। अब चुनाव आयोग ने इन तीनों खाली सीटों को भरने के लिए उपचुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। इसे राज्यसभा की आकस्मिक सीटों को भरने का चुनाव कहा जा रहा है। अगर चुनाव के पूरे शेड्यूल पर नजर डाले तो...

7 जुलाई: चुनाव की आधिकारिक अधिसूचना जारी होगी।
14 जुलाई: नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख होगी।
15 जुलाई: नामांकन पत्रों की जांच की जाएगी।
17 जुलाई: नाम वापस लेने की आखिरी तारीख होगी।
24 जुलाई: सुबह 9:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक वोट डाले जाएंगे। 
इसी दिन शाम 5:00 बजे से वोटों की गिनती शुरू हो जाएगी और रात तक नतीजे आ जाएंगे।

आपको बता दे लोगों का कहना है कि अगर इन तीन सीटों के लिए सिर्फ तीन ही उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं, तो चुनाव की नौबत ही नहीं आएगी और 17 जुलाई को नाम वापसी के समय ही उम्मीदवारों को निर्विरोध विजेता घोषित कर दिया जाएगा! वहीं अब आप सोच रहे होंगे कि बंगाल की सीटें हैं, तो क्या टीएमसी इन्हें वापस नहीं जीत सकती? तो जवाब है....बिल्कुल नहीं! दरअसल, पश्चिम बंगाल विधानसभा का मौजूदा गणित पूरी तरह बदल चुका है। इस समय बंगाल विधानसभा में बीजेपी के पास 207 विधायकों का प्रचंड बहुमत है, जबकि तृणमूल कांग्रेस सिमटकर सिर्फ 80 सीटों पर रह गई है। कांग्रेस के पास और हुमायूं कबीर की पार्टी के पास मिलाकर दो सीटें हैं, जबकि CPI और AISF के पास एक-एक सीट है। ऊपर से टीएमसी के अंदर दो फाड़ साफ नजर आ रही है। इस अंकगणित के हिसाब से बीजेपी के तीनों उम्मीदवारों की जीत पूरी तरह तय है। कहा जा रहा है कि बीजेपी इन तीनों बागी नेताओं...सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बराइक को ही अपना उम्मीदवार बना सकती है। सुखेंदु और प्रकाश वाली सीटों का कार्यकाल मार्च 2029 तक है, जबकि सुष्मिता देव वाली सीट का कार्यकाल अप्रैल 2030 तक है। यानी बीजेपी को लंबे समय के लिए तीन मजबूत सांसद मिलने वाले हैं।

आपको बता दें इस उपचुनाव के नतीजे देश की राजनीति की दिशा और दशा बदल देंगे। हाल ही में आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में शामिल होने के बाद राज्यसभा में बीजेपी की संख्या 113 तक पहुंच गई थी। अब इन 3 नई जीतों के बाद बीजेपी अकेले दम पर 116-117 के आंकड़े पर पहुंच जाएगी। यह बीजेपी के इतिहास में राज्यसभा में उसकी अब तक की सबसे सर्वाधिक और रिकॉर्ड संख्या होगी! बीजेपी अपने दम पर ही राज्यसभा में सामान्य बहुमत के बिल्कुल करीब पहुंच जाएगी। आपको बता दें कि पिछले 40 सालों में देश के इतिहास में किसी भी एक अकेले दल को राज्यसभा में अपने बूते बहुमत नहीं मिला है। इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में कांग्रेस के पास राज्यसभा में इतनी भारी संख्या थी। सिर्फ इतना ही नहीं, इन तीन सीटों पर जीत के बाद संसद के उच्च सदन में NDA का कुल आंकड़ा बढ़कर 155 तक पहुंच जाएगा। इसका मतलब साफ है कि मोदी सरकार राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत के बेहद करीब पहुंच जाएगी। इसका सीधा असर यह होगा कि आगामी मॉनसून सत्र में सरकार कई बेहद महत्वपूर्ण और कड़े संविधान संशोधन विधेयक संसद में ला सकती है, जिन्हें पास कराने में अब विपक्ष NDA को चाहकर भी नहीं रोक पाएगा!

कुल मिलाकर बंगाल का यह सियासी दंगल अब पूरी तरह साफ हो चुका है! एक तरफ जहां ममता बनर्जी के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई है और उनके अपने ही साथी उनका साथ छोड़कर जा चुके हैं, तो वहीं दूसरी तरफ बीजेपी ने बंगाल के रास्ते दिल्ली के उच्च सदन को पूरी तरह से फतह करने की तैयारी कर ली है। 24 जुलाई को होने वाला यह चुनाव सिर्फ तीन सीटों का चुनाव नहीं है, बल्कि यह 2026 की राजनीति का वो मोड़ है, जो आने वाले कई सालों तक देश की संसद की तस्वीर तय करेगा। देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी कब इन तीनों नेताओं को आधिकारिक रूप से भगवा चोला पहनाती है और कब संसद में प्रचंड बहुमत का नया इतिहास लिखा जाता है। 

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