सफेद सिरस की खेती: शुरुआती किसानों के लिए गाइड
सफेद सिरस, जिसे सिल्क वर्म (White Silkworm) भी कहा जाता है, रेशम उत्पादन के लिए प्रमुख स्रोत है। रेशम उद्योग में इसका महत्त्व बहुत अधिक है, और यह किसानों के लिए आय का एक स्थिर साधन बन सकता है।
सफेद सिरस क्या है?
सफेद सिरस का संबंध रेशमी कीड़े से है, जो शहतूत (Mulberry) के पत्तों पर पलता है। यह कीड़ा रेशमी लार (Silk Thread) बनाता है, जिसे बाद में रेशमी धागा तैयार करने में उपयोग किया जाता है।
सफेद सिरस की खेती के लिए आवश्यकताएँ
भूमि और जलवायु
खेती के लिए समतल भूमि और अच्छी जल निकासी वाली जगह जरूरी है।
तापमान 23-28°C और आद्रता 70% के आसपास अनुकूल रहती है।
पौधा चयन
सफेद सिरस के लिए मुख्य रूप से शहतूत (Mulberry) के पत्ते की जरूरत होती है।
पौधों को खेत में 6-8 महीने पहले रोपित कर लें, ताकि पर्याप्त पत्तियाँ उपलब्ध हों।
कीट पालन (Silkworm Rearing)
अंडों (Eggs) से छेड़े (Larvae) तैयार करें।
इन्हें साफ और हवादार कमरे में रखें।
नियमित रूप से ताजे शहतूत के पत्ते खिलाएँ।
स्वच्छता और देखभाल
कीड़े संक्रामक रोगों के प्रति संवेदनशील होते हैं।
पालने वाले कमरे में धूल और कीट-मिट्टी से बचाव करें।
फसल की कटाई और रेशम उत्पादन
जब कीड़ा पूरी तरह विकसित हो जाए, तो यह कोकून (Cocoon) बनाना शुरू करता है।
कोकून से रेशमी धागा निकालकर बाजार में बेचा जाता है।
एक एकड़ शहतूत खेत से प्रति वर्ष 500-600 किलो कोकून और 50-60 किलो रेशमी धागा प्राप्त किया जा सकता है।
लाभ और संभावनाएँ
आय का स्थिर स्रोत: रेशम का निर्यात अंतरराष्ट्रीय बाजार में होता है, इसलिए अच्छी आमदनी मिलती है।
कम भूमि में उत्पादन: अन्य फसलों की तुलना में कम जगह में अधिक लाभ।
सरकारी योजनाएँ: भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा सिल्क उद्योग के लिए अनुदान और तकनीकी सहायता उपलब्ध है।
सफेद सिरस की खेती एक लाभदायक और टिकाऊ व्यवसाय है। सही तकनीक, स्वच्छता और पौधों का सही रख-रखाव सफलता की कुंजी है। यदि किसान नियमित देखभाल और बाजार की मांग को समझकर काम करें, तो यह व्यवसाय निश्चित रूप से लाभकारी साबित हो सकता है।

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