WHO से अलग होना ट्रंप का मास्टरस्ट्रोक या ऐतिहासिक भूल?

अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से अपना रिश्ता पूरी तरह खत्म कर लिया है। इसके साथ ही आर्थिक मदद, नीति सहयोग और तकनीकी भागीदारी पर भी पूर्ण विराम लगा दिया गया है। यह फैसला वैश्विक स्वास्थ्य ढांचे के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

 

इस फैसले की कमान किसके हाथ में थी?

यह कदम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में उठाया गया है। उनके दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से दूरी बनाने की नीति को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाया है।

 

यह बदलाव कब लागू हुआ?

WHO से अलग होने की प्रक्रिया 20 जनवरी 2025 को शुरू की गई थी और अब 22 जनवरी 2026 को इसे औपचारिक रूप से पूरा कर लिया गया है।

 

दुनिया के किन हिस्सों पर पड़ेगा असर?

इस फैसले का सबसे ज़्यादा प्रभाव उन देशों पर पड़ेगा जो स्वास्थ्य सेवाओं के लिए WHO पर निर्भर हैं—खासतौर पर अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के विकासशील और गरीब राष्ट्र।

 

ट्रंप प्रशासन ने दूरी क्यों बनाई?

अमेरिकी सरकार का आरोप है कि WHO ने कोविड-19 संकट के दौरान गंभीर रणनीतिक चूक की और कुछ देशों के राजनीतिक दबाव में काम किया। साथ ही कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर “वोक विचारधारा” को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया है, जिसे अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों के खिलाफ मानता है।

 

अमेरिका ने यह रणनीति कैसे लागू की?

  • WHO को दी जाने वाली सभी वित्तीय सहायता तत्काल बंद
  • जिनेवा समेत दुनियाभर के WHO कार्यालयों से अमेरिकी स्टाफ की वापसी
  • संगठन से जुड़े सभी औपचारिक दायित्व समाप्त
  • बीते एक साल में लगभग 70 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और समझौतों से अलगाव
  •   हालांकि, अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, WFP और UNHCR जैसे मंचों से जुड़ा रहेगा, जिन्हें वह रणनीतिक और मानवीय दृष्टि से अहम मानता है।

 

नतीजा क्या निकलता है?

78 वर्षों तक WHO का अहम हिस्सा रहने के बाद अमेरिका का अलग होना वैश्विक सहयोग की दिशा में बड़ा बदलाव है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य की महामारियों से निपटने की सामूहिक क्षमता कमजोर हो सकती है—और अंततः इसका असर अमेरिका पर भी लौटकर आ सकता है।

 

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