पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में महिलाओं को 33% का असली सच
भारतीय राजनीति में एक तरफ संसद में महिला आरक्षण को लेकर पेश किया गया संशोधन विधेयक गिर गया, तो दूसरी तरफ चुनावी राज्यों पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में इसे लेकर सियासी घमासान मच गया है। पीएम मोदी ने विपक्ष को पाप का भागी बताया, तो ममता बनर्जी और एम.के. स्टालिन की पार्टियों ने डेटा के साथ बीजेपी को आईना दिखाया। अब सवाल यह है कि क्या पार्टियां वास्तव में महिलाओं को भागीदारी दे रही हैं या यह सब महज 33 प्रतिशत का चुनावी मायाजाल है? आइए जानते हैं।
दरअसल, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी और बीजेपी के बीच महिला उम्मीदवारों को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है। ममता बनर्जी का दावा है कि उनकी पार्टी ने बिना किसी कानून के ही महिलाओं को सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया है।
पार्टी ने 291 सीटों में से 52 महिलाओं को मैदान में उतारा है। टीएमसी का कहना है कि संसद में उनके करीब 37.9% सांसद महिलाएं हैं, जो किसी भी अन्य दल से अधिक है। वहीं बीजेपी ने सभी 294 सीटों पर उम्मीदवार दिए हैं, लेकिन महिलाओं की भागीदारी में गिरावट देखी गई है।
भाजपा में 294 में से केवल 33 महिलाओं को टिकट मिला है। ऐसे में विपक्ष का कहना है कि पिछली बार 38 महिलाओं को उतारने वाली बीजेपी अब अपने ही रिकॉर्ड से पीछे खिसक गई है। वहीं कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस ने 35 और वामपंथी दलों ने 34 महिलाओं को चुनावी रण में उतारा है। वहीं बीते दिनों पीएम मोदी ने बंगाल में हुंकार भरते हुए कहा, "टीएमसी और कांग्रेस ने मिलकर 2029 में मिलने वाले आरक्षण को रोकने की साजिश रची है। देश की महिलाएं इस भ्रूणहत्या जैसे अपराध के लिए उन्हें कभी माफ नहीं करेंगी।
आपको बता दें तमिलनाडु की 234 सीटों पर भी महिला आरक्षण एक निर्णायक मुद्दा बन चुका है। यहां कुल 442 महिला उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रही हैं। जिसमें...
सत्तारूढ़ DMK ने 175 में से 19 महिलाओं को उम्मीदवार बनाया है।
AIADMK ने 170 सीटों में से 21 महिलाओं को टिकट दिया है।
BJP बीजेपी ने केवल 6 महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारा है।
कांग्रेस ने 28 में से केवल 2 महिलाओं को टिकट दिया है।
TVK ने चुनाव में 24 महिलाओं को उतारकर सबको चौंका दिया है।
आपको बता दें 17 अप्रैल को संसद में लाया गया यह विधेयक इसलिए गिर गया क्योंकि इसे दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका। जहां पक्ष ने 298 वोट और विपक्ष ने 230 वोट दिए। लेकिन इस बिल को पास होने के लिए 352 वोटों की जरूरत थी। हालांकि कांग्रेस और अन्य दलों का आरोप है कि सरकार महिला आरक्षण को 'परिसीमन' से जोड़कर उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण भारत की सीटें कम करने की साजिश रच रही थी। ममता बनर्जी ने इसे महिलाओं को ढाल बनाकर किया गया राजनीतिक खेल करार दिया।
कुल मिलाकर देखा जाए तो महिला आरक्षण का मुद्दा अब केवल संसद की फाइलों तक सीमित नहीं है, यह बंगाल की गलियों और तमिलनाडु के समुद्र तटों तक पहुंच चुका है। बीजेपी जहाँ 2029 के वादे के साथ महिलाओं को गोलबंद कर रही है, वहीं टीएमसी और डीएमके जैसे क्षेत्रीय दल अपने मौजूदा आंकड़ों के दम पर खुद को असली हिमायती साबित करने में जुटे हैं। 23 अप्रैल को होने वाले मतदान में यह देखना दिलचस्प होगा कि देश की नारी शक्ति बीजेपी के वादे पर भरोसा करती है या विपक्ष के इन आंकड़ों पर। राजनीति के इस बिसात पर शह और मात का खेल अब सीधे वोट की चोट से तय होगा!

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