निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
हर साल 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य हिंदी भाषा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना और उसके उपयोग को बढ़ावा देना है। 1975 में इसी दिन पहला विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित हुआ था। हिंदी आज करोड़ों लोगों की मातृभाषा है और यह हमारी संस्कृति, परंपरा व भावनाओं की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति है। विश्व हिंदी दिवस हमें अपनी भाषा के संरक्षण, संवर्धन और सम्मान का संदेश देता है।
इस हिंदी दिवस पर प्रस्तुत है आपके लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा कविता -
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।
उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।
निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय।
इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।
और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।
भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।
सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।
- भारतेंदु हरिश्चंद्र

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