सवालों से शुरू हुआ विवाद धमकियों तक पहुंचा? महिला पत्रकार के दावों से हंगामा
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक ऐसा वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल चुका है जिसने सियासी गलियारों से लेकर मीडिया जगत तक में भूचाल ला दिया है! माजरा क्या है? माजरा ये है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब महिला पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव ने तीखे सवाल पूछे, तो वीडियो ने इंटरनेट पर तहलका मचा दिया। एक तरफ बहस छिड़ गई है कि क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना गुनाह हो गया है? तो दूसरी तरफ सवाल उठ रहे हैं कि बिना तय शेड्यूल के माइक अड़ाना कितना जायज है? आइए आपको बताते हैं कि उस दिन लखनऊ में आखिर हुआ क्या था?
दरअसल, तारीख 12 सितंबर 2026, जगह लखनऊ। मौका था भाजपा के 'सेवा संकल्प अभियान' को लेकर बुलाई गई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का। मंच पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत पार्टी के बड़े दिग्गज मौजूद थे। कार्यक्रम खत्म हुआ और जब मुख्यमंत्री मंच से जाने लगे, तो स्वतंत्र पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव ने अपना फोन निकाला और सीधा सवाल दाग दिया कि "मुख्यमंत्री जी, यह प्रेस कॉन्फ्रेंस है और आप किसी सवाल का जवाब भी नहीं दे रहे हैं। आपने प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों बुलाई? सिर्फ इसलिए कि हम आपकी बात सुनें?" इसके बाद सीएम योगी मुस्कुराते हुए या हाथ से इशारा करते हुए आगे निकल गए और उनके पीछे-पीछे बाकी नेता भी चलते बने।
पर असली कहानी तो इसके बाद शुरू होती है! दिव्या का दावा है कि जैसे ही वो बाहर आईं, कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया। उनके साथ बदसलूकी की गई, कैमरा बंद करने का दबाव बनाया गया। बात यहीं खत्म नहीं हुई, दिव्या का रोते हुए इंस्टाग्राम वीडियो सामने आया जिसमें वो कह रही हैं कि उन्हें सोशल मीडिया पर गंदी-गंदी गालियां, रेप और जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं, यहां तक कि उनके घर पर बुलडोजर चलवाने तक की बात कही जा रही है। दिव्या ने उन तमाम अफवाहों को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा जा रहा था कि उन्हें किसी विपक्षी पार्टी ने वहां भेजा था। उनका कहना है कि वो एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और वो सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सबसे कड़े सवाल पूछती हैं।
वहीं दूसरी तरफ इस पूरे घटनाक्रम के बाद यूपी की राजनीति में भूचाल आ गया है! समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने सरकार पर करारा तंज कसते हुए सोशल मीडिया पर लिख दिया कि अब 'प्रेस वार्ता' का नाम बदलकर 'प्रेस एकालाप' रख देना चाहिए, क्योंकि जब सुनना ही नहीं है तो वार्ता किस बात की! वहीं कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी दिव्या का समर्थन करते हुए योगी सरकार पर तानाशाही का गंभीर आरोप लगा डाला। लेकिन भाई, कहानी का दूसरा पहलू भी सुनना उतना ही जरूरी है। जी हां बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज किया है। भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी का दो टूक कहना है कि यह प्रेस कॉन्फ्रेंस सिर्फ 'सेवा संकल्प अभियान' की जानकारी देने के लिए बुलाई गई थी, इसमें पहले से कोई सवाल-जवाब का सेशन तय ही नहीं था।
भाजपा का कहना है कि सिर्फ पब्लिसिटी पाने और वीडियो के जरिए सनसनी फैलाने के लिए वहां यह सब ड्रामा किया गया। भाजपा ने यह भी सलाह दी है कि अगर दिव्या को वाकई कोई धमकी मिल रही है, तो वो सीधे पुलिस के पास जाएं, प्रशासन उनकी पूरी मदद करेगा। लेकिन इस पूरे मामले का एक और पहलू भी है। दिव्या श्रीवास्तव के बारे में सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं। उन्हें किसी राजनीतिक दल से जोड़ने की कोशिश भी हुई। दिव्या इन दावों को लगातार खारिज कर रही हैं। वह खुद को स्वतंत्र डिजिटल पत्रकार बताती हैं। उनके मुताबिक, वह जनता के मुद्दों पर सवाल पूछती हैं और किसी एक राजनीतिक दल की पत्रकार नहीं हैं। दिव्या का दावा है कि वह लखनऊ में अकेली रहती हैं और धमकियों के बाद उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता हो रही है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि...
पत्रकारों को सत्ता से सवाल पूछने की कितनी आजादी होनी चाहिए?
क्या प्रेस कॉन्फ्रेंस सिर्फ सरकार या पार्टी का पक्ष रखने का मंच है?
या फिर पत्रकारों के सवालों का जवाब देना भी लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा है?
और अगर किसी पत्रकार के साथ वास्तव में धमकी या बदसलूकी हुई है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
इन सवालों के जवाब अब इस पूरे विवाद के केंद्र में हैं। फिलहाल स्थिति यह है कि एक तरफ एक महिला पत्रकार अपनी सुरक्षा और अधिकारों की गुहार लगा रही है, तो दूसरी तरफ सत्ता पक्ष इसे पब्लिसिटी स्टंट बता रहा है। एक 30 सेकंड के छोटे से वीडियो ने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सियासी तापमान को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। अब देखना यह है कि यह मामला सिर्फ सोशल मीडिया की लड़ाई बनकर रह जाता है या फिर इसके तार किसी बड़ी कानूनी कार्रवाई तक पहुंचते हैं!
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