एटा के पिलखतरा गांव में 1008 मोनी बाबा की 62 दिन की अग्नि तपस्या बनी आस्था का केंद्र
उत्तर प्रदेश के Etah जिले का पिलखतरा गांव इन दिनों किसी साधारण गांव की तरह नहीं, बल्कि एक गहरे आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र की तरह नजर आ रहा है। यहां 1008 मोनी बाबा पिछले 62 दिनों से कठिन अग्नि तपस्या और मौन साधना में लीन हैं, जिसने पूरे क्षेत्र को श्रद्धा और जिज्ञासा से भर दिया है.23 अप्रैल से शुरू हुई यह तपस्या 26 जून को पूर्ण होने की बात कही जा रही है। इस दौरान बाबा ने न केवल मौन व्रत धारण किया हुआ है, बल्कि जल, नींद और सामान्य संवाद जैसी मूलभूत आवश्यकताओं से भी स्वयं को दूर रखा है। उनकी यह साधना लोगों के लिए आस्था और रहस्य दोनों का विषय बन गई है।
दूर-दूर से उमड़ रही श्रद्धालुओं की भीड़
पिलखतरा गांव में प्रवेश करते ही भजन-कीर्तन, जयकारों और धार्मिक माहौल का अनुभव होता है। तपस्थल पर लगातार पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान चल रहे हैं। आसपास के जिलों—हाथरस, अलीगढ़, कासगंज, फिरोजाबाद और आगरा—से श्रद्धालु लगातार यहां पहुंच रहे हैं।
स्थानीय संत Raghvendra Anand Saraswati सहित कई साधु-संतों की मौजूदगी ने इस तपस्थल को और अधिक आध्यात्मिक वातावरण प्रदान किया है। श्रद्धालु यहां पहुंचकर बाबा के दर्शन कर अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं।
‘मोनी बाबा’ क्यों कहलाते हैं?
ग्रामीणों के अनुसार मोनी बाबा लंबे समय से कठोर साधनाओं और मौन व्रत के लिए जाने जाते हैं। सांसारिक जीवन का त्याग कर उन्होंने संन्यास मार्ग अपनाया और अपना जीवन पूर्ण रूप से साधना को समर्पित कर दिया। इसी मौन साधना की वजह से उन्हें “मोनी बाबा” के नाम से जाना जाता है।
व्यवस्थाओं में जुटा गांव
श्रद्धालुओं की लगातार बढ़ती भीड़ को देखते हुए गांव के लोगों ने खुद ही व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभाल ली है। पेयजल, बैठने की व्यवस्था, छाया और प्रसाद वितरण जैसी सुविधाएं स्थानीय ग्रामीण और स्वयंसेवक मिलकर संभाल रहे हैं।
भीड़ नियंत्रण के लिए अलग-अलग टीमों को तैनात किया गया है ताकि व्यवस्था बनी रहे और श्रद्धालुओं को किसी तरह की असुविधा न हो।
26 जून को होगा भव्य समापन
स्थानीय लोगों के अनुसार, 26 जून को मोनी बाबा की तपस्या पूर्ण होने पर विशाल भंडारे का आयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर भारी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना जताई जा रही है, जिसके लिए तैयारियां तेजी से चल रही हैं।
पिलखतरा की यह साधना अब सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन और अध्यात्म की एक जीवंत मिसाल बन चुकी है।
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