फिटकरी के गणेशजी - परंपरा से पर्यावरण पुरकता की और नयी पहल
मलकापुर (बुलढाणा) : गणेशोत्सव आस्था, संस्कृति और मंगल का त्योहार है। लेकिन बदलते समय के साथ इस आस्था को पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर त्योहार को और अधिक सार्थक बनाने की जरूरत है। इसी सोच के साथ महाराष्ट्र शासन अधिस्वीकृत वरिष्ठ पत्रकार तथा सी न्यूज भारत बुलढाणा ब्युरो चीफ संदीप सावजी (मलकापुर, जिला बुलढाणा) ने इस साल के गणेशोत्सव के लिए 'फिटकरी के गणपति' (तुरटीचा गणपती) की एक बेहद अनोखी, नई और पर्यावरण-अनुकूल (Eco-friendly) अवधारणा को हकीकत में बदला है।
सोच को मिला उद्योजक का साथ..
गणेश मूर्ति बनाने के लिए पारंपरिक सामग्रियों का विकल्प खोजते हुए संदीप सावजी के मन में फिटकरी से मूर्ति बनाने का अनोखा विचार आया। उन्होंने इस विचार को केवल मन में रखने के बजाय सीधे फिटकरी निर्माता (उद्योजक) से संपर्क किया और अपनी योजना साझा की। निर्माता ने भी इस पर्यावरण-अनुकूल पहल के महत्व को समझा और तुरंत सहयोग के लिए आगे आए। नतीजा यह हुआ कि आस्था और विज्ञान, परंपरा और पर्यावरण-चेतना का एक बेहद खूबसूरत संगम देखने को मिला।इस मूर्ति की एक और बड़ी खासियत यह है कि इसमें केमिकल युक्त रंगों के अनावश्यक उपयोग को पूरी तरह से टाला गया है। इसके जरिए समाज को यह संदेश दिया गया है कि गणेश मूर्ति के माध्यम से प्रकृति को कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।क्यों खास है 'फिटकरी के गणपति' का यह विकल्प?फिटकरी (Alum) एक खनिज-आधारित सामग्री है जिसका उपयोग पानी को साफ और शुद्ध करने के लिए भी किया जाता है। इससे बनी मूर्ति पारंपरिक प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) की मूर्तियों के मुकाबले पर्यावरण के लिहाज से एक नया और सुरक्षित विकल्प पेश करती है:
POP का बेहतरीन विकल्प:
इस अवधारणा को प्लास्टर ऑफ पेरिस के इस्तेमाल को रोकने के एक मजबूत विकल्प के रूप में देखा जा सकता है।
केमिकल रंगों से मुक्ति:
मूर्ति निर्माण में कृत्रिम और रासायनिक रंगों का उपयोग न करके, पानी में मिलने वाले हानिकारक रसायनों को रोकने का संदेश दिया गया है।
जल प्रदूषण पर रोक:
विसर्जन के बाद जल स्रोतों में जाने वाले रंग, प्लास्टिक या अन्य कृत्रिम सजावटी सामानों से होने वाले प्रदूषण को कम करने की दिशा में यह पहल बेहद प्रेरणादायक है।
आस्था और पर्यावरण का संतुलन:
पारंपरिक आस्था को ठेस पहुंचाए बिना, 'त्योहार भी मनाएंगे और पर्यावरण भी बचाएंगे' का एक सुंदर संतुलन इस माध्यम से साधा गया है।
बदलती सामाजिक मानसिकता:
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गणेशोत्सव के बहाने समाज में इको-फ्रेंडली विकल्पों के बारे में सोचने की एक नई मानसिकता तैयार करने का यह एक अभिनव प्रयास है।
आस्था की मिट्टी में पर्यावरण-चेतना की खुशबू'
गणपति बाप्पा मोरया' का जयघोष करते समय प्रकृति के अस्तित्व को भी नमन किया जाना चाहिए, यही इस सोच के पीछे की व्यापक भावना है। भक्ति केवल पूजा घर तक सीमित न रहकर नदी, जल स्रोतों, मिट्टी, पेड़ों और पूरे पर्यावरण की रक्षा तक पहुंचनी चाहिए, यही मूल्यवान संदेश 'फिटकरी के गणपति' के माध्यम से दिया जा रहा है।एक पत्रकार के रूप में सामाजिक मुद्दों और समाजोपयोगी गतिविधियों को लगातार प्रमोट करने वाले संदीप सावजी ने इस बार अपने खुद के आचरण से पर्यावरण संरक्षण का यह संदेश दिया है। एक नई सोच को उद्योजक का सकारात्मक साथ मिलना और उससे इस गणेश मूर्ति का साकार होना—'एक विचार, एक कृति और उससे मिलने वाली सामाजिक प्रेरणा' का बेहतरीन उदाहरण है।
आवाहन :
बाप्पा की सच्ची आराधनापरंपरा निभाएं, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं।आस्था बढ़ाएं, लेकिन प्रकृति को नुकसान पहुंचाकर नहीं।क्योंकि बाप्पा की सच्ची आराधना का मतलब है—'प्रकृति को बचाने का संकल्प और आने वाली पीढ़ी के लिए स्वच्छ पर्यावरण की विरासत!'इस अनोखे 'फिटकरी के गणपति' के विचार की समाज के विभिन्न स्तरों पर जमकर सराहना हो रही है। आने वाले समय में गणेशोत्सव को अधिक से अधिक इको-फ्रेंडली, टिकाऊ और अनुकरणीय बनाने के लिए यह पहल निश्चित रूप से मील का पत्थर साबित होगी।
रिपोर्टर : प्रसन्न व्यवहारे
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