प्रशासनिक उपेक्षा की शिकार पिलवानी की विधवा आदिवासी महिला: आवास योजना न घर में शौचालय।

​देवास : ग्राम पिलवानी डिजिटल इंडिया और 'हर घर आवास' के दावों के बीच जमीनी हकीकत आज भी कुछ गांवों में बेहद कड़वी है। जनपद पंचायत सोनकच्छ के अंतर्गत आने वाले ग्राम पिलवानी से एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जहाँ एक गरीब आदिवासी विधवा महिला सरकारी सिस्टम की बेरुखी के कारण नारकीय जीवन जीने को मजबूर है।

​कच्चे मकान में कट रही जिंदगी, योजनाओं से दूरी

​ग्राम पिलवानी निवासी लीला बाई (पति स्व.अमर सिंह) की स्थिति शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं की पोल खोल रही है। लीला बाई के पास रहने के लिए एक जर्जर कच्चा मकान है, जिसकी छत बारिश में टपकती है और गर्मी में भट्टी की तरह तपती है। प्रधानमंत्री आवास योजना की कतार में खड़े-खड़े सालों बीत गए, लेकिन लीला बाई का नाम आज भी सरकारी फाइलों में 'पात्र' होने का इंतजार कर रहा है।

शौचालय नहीं: सुरक्षा और सम्मान दांव पर

​आवास तो दूर, महिला को स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय तक नसीब नहीं हुआ। लीला बाई ने बताया: ​"उम्र के इस पड़ाव पर और अकेले होने के बावजूद मुझे खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। कई बार पंचायत के चक्कर लगाए, अधिकारियों से गुहार की, लेकिन आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला।" ​शौचालय न होने से न केवल उनका स्वास्थ्य खतरे में है, बल्कि एक महिला की गरिमा और सुरक्षा पर भी हर रोज सवालिया निशान खड़ा होता है। ​ग्रामीणों में रोष: कागजों पर दौड़ रही योजनाएं ​स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पात्र होते हुए भी लीला बाई को लाभ न मिलना प्रशासन की बड़ी लापरवाही है। ग्रामीणों ने मांग की है कि: ​मामले की तत्काल निष्पक्ष जांच हो। महिला को तुरंत प्रधानमंत्री आवास और शौचालय स्वीकृत किया जाए। ​लापरवाह अधिकारियों और पंचायत प्रतिनिधियों पर कड़ी कार्रवाई हो। ​बड़ा सवाल: कब जागेगा प्रशासन ? ​जब सरकार 'अंत्योदय' (अंतिम व्यक्ति का उदय) की बात करती है, तो लीला बाई जैसी महिलाएं उस कतार में सबसे आगे होनी चाहिए। अब देखना यह है कि इस खबर के बाद जिला प्रशासन और संबंधित विभाग इस विधवा महिला की सुध लेते हैं या लीला बाई की यह गुहार फाइलों के नीचे दबी रह जाएगी।

रिपोर्टर : साजिद पठान

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