डॉ ऋचा मिश्रा---नेतृत्व और संघर्ष का जीवंत व्यक्तित्व


समाज सेवा, शिक्षा और स्वास्थ्य—इन तीनों मजबूत स्तंभों पर खड़ी एक ऐसी शख्सियत से सी न्यूज भारत ने बात की , जिन्होंने न केवल मेडिकल क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों और महिलाओं के जीवन में उल्लेखनीय परिवर्तन लाने का सतत प्रयास भी किया है। डॉ. रिचा मिश्रा, शेखर हॉस्पिटल लखनऊ की डायरेक्टर, हिंद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज व अद्यानंत इंस्टीट्यूट की चेयरपर्सन, और श्री बालाजी चैरिटेबल ट्रस्ट की संस्थापक—एक ऐसी महिला नेतृत्वकर्ता हैं जो संघर्ष, संवेदना और संकल्प का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती हैं। शिक्षा, रोजगार और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया है। इसी विशेष मुलाकात में, उन्होंने अपने सफर, चुनौतियों, समाज सेवा के उद्देश्यों और महिलाओं को समर्पित मेडिकल कॉलेज के अपने बड़े सपने पर खुलकर बातचीत की।

आपकी जीवन यात्रा संघर्ष से सफलता तक कैसी रही?

डॉ. रिचा मिश्रा ने बताया कि उनका जीवन संघर्षों से भरा जरूर था, लेकिन वह किसी अलग तरह का संघर्ष नहीं मानतीं। एक महिला होने के नाते जो चुनौतियाँ आज भी स्त्रियाँ झेलती हैं, वही सब उन्होंने भी झेला। उन्होंने कहा कि वे संतुष्ट हैं क्योंकि जितनी मेहनत की, उससे कहीं अधिक मिला। उनके अनुसार अगर हिम्मत न हारें तो रास्ते खुद बनते चले जाते हैं।

आपने कहा था कि आप इतिहास रचने आई हैं,क्या इतिहास रचेंगी?

डॉ. रिचा मिश्रा के अनुसार, बिना पैसे के मेडिकल कॉलेज बनाने की कल्पना भी किसी ने नहीं की थी, लेकिन उन्होंने इसे सच कर दिखाया। यूपी में निजी मेडिकल कॉलेजों में से यह उन शुरुआती कॉलेजों में था जिसे उन्होंने केवल लोगों के भरोसे और मेहनत के दम पर खड़ा किया। उनका मानना है कि यही अपने आप में एक इतिहास है।

डॉक्टर, समाजसेवी और चेयरमैन,इन तीनों भूमिकाओं को कैसे संभालती हैं?

डॉ. रिचा मिश्रा ने कहा कि हेल्थ और समाज सेवा दोनों ही एक-दूसरे से जुड़े हैं। एक मेडिकल कॉलेज में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार—तीनों एक साथ मिलते हैं। उन्होंने बताया कि एक कॉलेज से 1000–1500 लोगों को रोजगार मिलता है और वे हमेशा कोशिश करती हैं कि क्षेत्र के लोगों को नौकरी मिले ताकि स्थानीय विकास हो।

 लड़कियों और ग्रामीण युवाओं को आगे बढ़ाने की प्रेरणा कैसे मिली?

डॉ. रिचा मिश्रा के अनुसार, दक्षिण भारत और पुणे में पढ़ाई के दौरान उन्होंने देखा कि वहाँ की लड़कियाँ आत्मनिर्भर और जागरूक हैं। जबकि यूपी की कई लड़कियाँ 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देती थीं। उन्होंने बताया कि तभी उन्होंने मन में संकल्प लिया कि ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों को पढ़ाई और रोजगार दिलाना ही उनकी वास्तविक समाज सेवा होगी।

पैरामेडिकल और नर्सिंग शिक्षा के भविष्य को कैसे देखती हैं?

डॉ. रिचा मिश्रा ने बताया कि आज भी पैरामेडिकल और नर्सिंग क्षेत्र में बड़ी कमी है। जहाँ 400 नर्सें चाहिए, वहाँ मुश्किल से 40 निकल पाती हैं। इसलिए यह क्षेत्र 100% जॉब गारंटी देता है। उन्होंने कहा कि 12वीं साइंस के बाद बच्चों के पास रोजगार की कई संभावनाएँ हैं।

एक महिला होने के नाते आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?

डॉ. रिचा मिश्रा ने कहा कि परिवार हमेशा साथ रहा, लेकिन बाहरी दुनिया में संघर्ष करना पड़ा। जब वे बड़े अधिकारियों से मिलने जातीं तो पूछा जाता—“आप क्यों आई हैं? किसी पुरुष को भेज देतीं।” सुरक्षात्मक चुनौतियाँ भी थीं।लेकिन डॉ. मिश्रा के अनुसार, अब माहौल बदल रहा है—समाज में महिलाओं के लिए सम्मान और अवसर दोनों बढ़े हैं।

समाज सेवा की भावना कब और कैसे जागी?

डॉ. रिचा मिश्रा ने बताया कि उनकी सबसे बड़ी इच्छा हमेशा महिलाओं को आगे बढ़ाने की रही। वे कहती हैं कि महिलाएँ अपनी सेहत को सबसे पीछे रखती हैं, इसलिए उन्होंने ब्रेस्ट कैंसर और सर्विक्स कैंसर के लिए बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए। उन्होंने कहा कि महिलाएँ अगर छह महीने में एक बार खुद जाँच करें, तो कई जानें बच सकती हैं।

आपका प्रेरणा स्रोत कौन है?

डॉ. रिचा मिश्रा के अनुसार, उन्हें सुधा मूर्ति जी से बहुत प्रेरणा मिलती है। कॉलेज के दिनों में उनका एक भाषण सुना था, और उनकी यह बात जीवनभर याद रही—
“दूसरे के पैसे पर खुशी नहीं टिकती, अपनी कमाई का छोटा सा पर्स भी बड़ी खुशी देता है।”

आपका सबसे बड़ा सपना क्या है?

डॉ. रिचा मिश्रा ने कहा कि उनका सबसे बड़ा सपना एक महिलाओं को समर्पित मेडिकल कॉलेज बनाना है—
जहाँ 75–80% स्टाफ महिलाएँ हों,
जहाँ लड़कियाँ सुरक्षित माहौल में पढ़ सकें,
और जहाँ महिला सशक्तिकरण की वास्तविक मिसाल स्थापित हो।
उन्होंने बताया कि इसके लिए प्रस्ताव मुख्यमंत्री को भेज दिया गया है।

स्वास्थ्य व्यवस्था में आज सबसे अधिक आवश्यकता किस सुधार की है?

डॉ. रिचा मिश्रा के अनुसार, अब समय इलाज से ज्यादा बीमारी रोकथाम पर ध्यान देने का है। योग, वॉक, स्वस्थ भोजन और नियमित जांच से 50–60% बीमारियाँ रुक सकती हैं। उन्होंने बताया कि सरकार द्वारा ब्लड, प्लेटलेट्स और आयुष्मान योजना में रेट्स तय किए जाने से आम जनता को बहुत राहत मिली है।

महिलाओं के पीछे रह जाने के लिए कौन जिम्मेदार—समाज, पुरुष या स्वयं महिला?

डॉ. रिचा मिश्रा ने कहा कि इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार खुद महिला होती है।
उनके अनुसार, यदि महिला आत्मनिर्भर और शिक्षित हो जाए, तो किसी भी तरह की सामाजिक या पारिवारिक रुकावट उसे रोक नहीं सकती। अवसर बहुत हैं, बस आत्मसम्मान और हिम्मत की आवश्यकता है।

डॉ. रिचा मिश्रा ने अपने अनुभवों और संघर्षों के जरिए यह स्पष्ट कर दिया कि सच्ची सफलता केवल पद और प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि समाज के लिए किए गए कार्यों और दूसरों की ज़िंदगी में सकारात्मक बदलाव लाने में निहित होती है। डॉ. रिचा मिश्रा के अनुसार, प्रेरणा और प्रतिबद्धता का संगम किसी भी महिला या युवा को अपने सपनों को साकार करने में सक्षम बना सकता है। उनकी यह यात्रा न केवल स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में एक मिसाल है, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो समाज में बदलाव लाना चाहता है। ऐसे व्यक्तित्व हमारे समाज को न केवल प्रोत्साहित करते हैं, बल्कि दिखाते हैं कि जब उद्देश्य स्पष्ट और मेहनत सच्ची हो, तो कोई भी चुनौती असंभव नहीं होती।

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