सिद्धांतों के साथ सेवा: सिग्मा डायग्नोस्टिक सेंटर के डायरेक्टर डॉ. विवेक कुमार यादव की कहानी

मेडिकल फील्ड में जहां आज इलाज के साथ-साथ कॉर्पोरेट दबाव, बिज़नेस मॉडल और एथिक्स को लेकर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं, वहीं देश में कुछ डॉक्टर ऐसे भी हैं जो अपने सिद्धांतों पर डटे रहते हैं। उत्तर प्रदेश के जाने-माने रेडियोलॉजिस्ट और सिग्मा डायग्नोस्टिक सेंटर के डायरेक्टर डॉ. विवेक कुमार यादव ऐसे ही डॉक्टरों में शामिल हैं।सी न्यूज़ भारत पॉडकास्ट में हुई खास बातचीत में डॉ. विवेक ने अपने बचपन से लेकर डॉक्टर बनने, रेडियोलॉजी चुनने, अपना डायग्नोस्टिक सेंटर खोलने और आगे की योजनाओं तक की पूरी कहानी साझा की... सिग्मा डायग्नोस्टिक सेंटर के डायरेक्टर डॉ. विवेक कुमार यादव की कहानी क्या कहता है चलिए बताते हैं - 

बनारस से मेडिकल जर्नी की शुरुआत

डॉ. विवेक कुमार यादव की शुरुआती पढ़ाई बनारस से हुई। वे खुद को स्कूल के दिनों में कोई टॉपर नहीं मानते, लेकिन पढ़ाई में ठीक-ठाक प्रदर्शन के साथ उन्होंने इंटरमीडिएट पास किया। डॉक्टर बनना उनका खुद का सपना नहीं था, बल्कि यह उनके पिता की इच्छा थी।चार साल के संघर्ष के बाद मेडिकल में चयन हुआ और उन्होंने चेन्नई से एमबीबीएस किया। इसके बाद पीजी की तैयारी के दौरान एक साल का गैप रहा, जिसमें उन्होंने दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में अलग-अलग विभागों में काम किया। फिर उनका चयन हुआ और उन्होंने लखनऊ से एमडी रेडियो डायग्नोसिस पूरा किया।

रेडियोलॉजी ही क्यों?

डॉ. विवेक बताते हैं कि रेडियोलॉजी उनकी पहली पसंद नहीं थी। एमबीबीएस के दौरान उनका झुकाव ईएनटी और ऑफ्थैल्मोलॉजी की ओर था। लेकिन जैसे-जैसे पढ़ाई आगे बढ़ी, उन्हें यह समझ आया कि रेडियोलॉजी एक ऐसी ब्रांच है जिसमें मरीज को बिना कष्ट दिए उसकी बीमारी के बारे में पूरी जानकारी दी जा सकती है।

उनका मानना है कि बिना चीर-फाड़ किए, बिना शारीरिक नुकसान पहुंचाए, अगर किसी मरीज को अधिकतम लाभ दिया जा सके, तो वही इलाज का सबसे बेहतर तरीका है। यही सोच उन्हें रेडियोलॉजी की ओर ले गई।

कंप्यूटर साइंस से डॉक्टर बनने तक

बचपन में डॉ. विवेक का सबसे ज्यादा इंटरेस्ट कंप्यूटर साइंस में था। वे इस विषय में अच्छे भी थे। आज भी उनके स्कूल फ्रेंड्स मज़ाक में कहते हैं कि अगर वे उस फील्ड में होते तो शायद कुछ बहुत बड़ा करते।हालांकि, पिता की इच्छा और परिवार की जिम्मेदारी को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने मेडिकल फील्ड को चुना। वे मानते हैं कि रेडियोलॉजी आज एक टेक्नोलॉजी-ड्रिवन फील्ड है, जहां कंप्यूटर, मशीनरी और अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बड़ी भूमिका है। इस तरह उन्हें टेक और मेडिकल—दोनों दुनिया का अनुभव मिला।

स्वभाव में सादगी, काम में अनुशासन

डॉ. विवेक अपने स्वभाव को शुरू से ही शांत और सीधा बताते हैं। वे अपने घर के बड़े बेटे हैं और बचपन से ही जिम्मेदारियों में ढले रहे। शरारतें कम और अनुशासन ज्यादा रहा।उनकी एक बहन हैं जिन्होंने एमबीए किया है और वर्तमान में स्कूल संचालन से जुड़ी हैं। छोटा भाई बीटेक और एमबीए के बाद यूपीएससी की तैयारी कर रहा है।

दोस्ती और प्रोफेशनल लाइफ का फर्क

वे मानते हैं कि स्कूल की दोस्ती में प्रतियोगिता कम होती है, जबकि कॉलेज और प्रोफेशनल लाइफ में कंपटीशन बढ़ जाता है। उनके कुछ स्कूल और कॉलेज के दोस्त आज भी उनके संपर्क में हैं, लेकिन प्रोफेशनल दुनिया में रिश्ते ज़्यादातर औपचारिक रह जाते हैं।

मेहनत ही सबसे बड़ी आदत

डॉ. विवेक खुद को शुरू से ही हार्ड वर्किंग मानते हैं। उनका मानना है कि अगर कोई काम हाथ में लिया है तो उसे अंत तक पहुंचाना उनकी आदत है। यही आदत उन्हें मेडिकल की कठिन पढ़ाई और प्रोफेशनल लाइफ में आगे ले गई।स्ट्रेस से निपटने के लिए कॉलेज के दिनों में दोस्त, घूमना और मूवीज़ मददगार रहीं, जबकि आज फैमिली और बच्चे उनका सबसे बड़ा सहारा हैं।

डॉक्टर या बिज़नेस?

आज मेडिकल फील्ड में बढ़ते कॉर्पोरेट कल्चर पर डॉ. विवेक खुलकर अपनी बात रखते हैं। वे मानते हैं कि बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों में बिज़नेस मोटिव हावी हो गया है, खासकर जहां गैर-चिकित्सक संस्थाएं संचालन कर रही हैं।हालांकि, वे यह भी साफ करते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि सभी डॉक्टर अनएथिकल हैं। पैसा जरूरी है, लेकिन एथिक्स को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

सिग्मा डायग्नोस्टिक सेंटर: अपने सिद्धांतों के साथ

इसी सोच के साथ डॉ. विवेक ने सिग्मा डायग्नोस्टिक सेंटर की स्थापना की। उनका उद्देश्य था—किसी के दबाव में काम न करना और अपने एथिक्स के साथ चिकित्सा सेवा देना।उन्होंने बैंक से लोन लेकर सेंटर शुरू किया। शुरुआत में फाइनेंशियल और लाइसेंसिंग से जुड़ी कई चुनौतियां आईं। नए होने के कारण नियम-कानून समझने में करीब 7–8 महीने लगे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

365 दिन बिना छुट्टी

डॉ. विवेक बताते हैं कि शुरुआती तीन साल उन्होंने बिना एक भी दिन छुट्टी लिए काम किया। संडे भी शामिल रहे। इसका असर फैमिली लाइफ पर पड़ा, लेकिन वे मानते हैं कि जब सब कुछ दांव पर हो, लोन की ईएमआई हो और सपना अपना हो, तो मोटिवेशन अपने आप मिल जाता है।

चार साल में बनी पहचान

चार से साढ़े चार साल के भीतर सिग्मा डायग्नोस्टिक सेंटर ने भरोसे की पहचान बना ली है। डॉ. विवेक के अनुसार, सबसे बड़ा गेन यह है कि लोगों को भरोसा है कि यहां गलत रिपोर्ट या अनएथिकल व्यवहार नहीं होता। यह पहचान वर्ड-ऑफ-माउथ से बनी है।

लेखन और कैमरे से दूरी

डॉ. विवेक को कभी लिखने का शौक रहा है—थोड़ी पोएट्री, थोड़े मोटिवेशनल विचार। हालांकि व्यस्त दिनचर्या के कारण यह आदत छूट गई। कैमरे के सामने आना उन्हें पसंद नहीं, वे खुद को सोशल और कैमरा शाई मानते हैं।

भविष्य की योजना: सेवा और विस्तार

आने वाले पांच सालों में डॉ. विवेक अपने डायग्नोस्टिक सेंटर की कई ब्रांचेस खोलना चाहते हैं। खासतौर पर वे ऐसे सेंटर शुरू करना चाहते हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को कम लागत में सेवाएं दे सकें।वर्तमान में वे सरकार की योजना के तहत हर महीने की 9 तारीख को गर्भवती महिलाओं के लिए निःशुल्क अल्ट्रासाउंड सेवा भी चला रहे हैं।

डॉ. विवेक कुमार यादव की कहानी एक ऐसे डॉक्टर की कहानी है, जिसने सुविधा से ज्यादा सिद्धांतों को चुना। उनकी यात्रा बताती है कि मेडिकल फील्ड में आज भी ईमानदारी, मेहनत और सेवा की भावना के साथ आगे बढ़ा जा सकता है—भले ही रास्ता थोड़ा कठिन क्यों न हो ...

अगर आप भी चाहते है ंडॉ. विवेक कुमार यादव का साथ या मागर्दशन तो , 

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सिग्मा इमेजिंग एंड डायग्नॉस्टिक्स

(विश्वास से समर्पण तक)

एल.जी.एफ.लीला टॉवर, खसरा नं. 120, रायपुर, आई.आई.एम रोड, लखनऊ 

मोबाइल नंबर 
9129436669, 9198196669

 

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