रक्षाबंधन पर नहीं सजती सुराना की कलाई, 800 साल पुरानी मान्यता में छिपी है खूनी कहानी

एटा : रक्षाबंधन यानी भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और स्नेह का पर्व। देशभर में इस दिन बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं, भाई उनकी रक्षा का संकल्प लेते हैं और घर-घर खुशियां मनाई जाती हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में एक ऐसा गांव भी है, जहां रक्षाबंधन की तस्वीर बिल्कुल अलग है। मुरादनगर क्षेत्र में हिंडन यानी हरनंदी नदी के किनारे बसे सुराना (सुराणा) गांव में स्थानीय परंपरा के अनुसार रक्षाबंधन नहीं मनाया जाता। गांव के कुछ परिवारों में इस दिन राखी बांधने की परंपरा नहीं है। स्थानीय लोगों के लिए यह दिन उत्सव के बजाय पूर्वजों की याद और कथित ऐतिहासिक त्रासदी से जुड़ा हुआ है। इस अनोखी परंपरा की कड़ी एटा की डॉ. रश्मी यादव (अधिवक्ता) से भी जुड़ती है। डॉ. रश्मी यादव अनिरुद्ध सोशल वेलफेयर सोसाइटी, उत्तर प्रदेश की सचिव हैं और उनका ससुराल सुराना गांव में है। वह भी परिवार में चली आ रही इस परंपरा के कारण रक्षाबंधन नहीं मनाती हैं।

तराईन के युद्ध से जुड़ी बताई जाती है कहानी डॉ. रश्मी यादव और स्थानीय लोगों के अनुसार, सुराना गांव से जुड़ी यह कहानी 12वीं शताब्दी तक जाती है। स्थानीय मान्यता के मुताबिक, करीब नौ सौ वर्ष पहले राजस्थान के अलवर क्षेत्र से यदुवंशी अहीर परिवार हरनंदी नदी के किनारे आकर बसे थे। समय के साथ यह बस्ती विकसित हुई और बाद में पृथ्वीराज चौहान के वंशजों तथा उनसे जुड़े योद्धाओं के यहां आने की भी लोककथा प्रचलित है। स्थानीय मान्यता इस कहानी को वर्ष 1192 के तराईन के दूसरे युद्ध से जोड़ती है। कहा जाता है कि इस युद्ध में मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को पराजित किया। इसके बाद चौहान पक्ष के कुछ सैनिकों और योद्धाओं ने सुराना में शरण ली। यहीं से शुरू होती है रक्षाबंधन से जुड़ी वह कहानी, जिसे गांव की पीढ़ियां आज तक सुनाती आ रही हैं। जब रक्षाबंधन के दिन गांव को घेरने की बात कही जाती है, स्थानीय लोगों के मुताबिक, मोहम्मद गौरी को जब सुराना में शरण लिए योद्धाओं की जानकारी हुई तो उसने गांव पर हमला किया। ग्रामीणों की मौखिक परंपरा में यह भी कहा जाता है कि बड़ी संख्या में सैनिकों ने गांव को चारों तरफ से घेर लिया था। गांव वालों के सामने कथित तौर पर शरण लिए लोगों को सौंपने या युद्ध करने का विकल्प रखा गया। स्थानीय कथा के अनुसार, गांव के लोगों ने शरण में आए योद्धाओं को सौंपने से इनकार कर दिया। और संयोग देखिए यह वही दिन था, जिसे आज पूरा देश भाई-बहन के प्रेम के त्योहार के रूप में मनाता है। लोककथा के अनुसार, उस दिन बहनों ने अपने भाइयों को राखी बांधी, तिलक लगाया और युद्ध के लिए विदा किया। इसके बाद गांव के योद्धाओं और हमलावर सेना के बीच भीषण संघर्ष हुआ। स्थानीय मान्यता में बड़ी संख्या में योद्धाओं के मारे जाने और बाद में गांव में नरसंहार किए जाने की कहानी सुनाई जाती है। हालांकि इस पूरी घटना के कई विवरण स्थानीय मौखिक परंपरा और मान्यता के रूप में सामने आते हैं, जिनका ऐतिहासिक दस्तावेजों से स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक है।दो बच्चों से जुड़ी है ‘छाबड़िया’ गोत्र की कहानी इस कहानी का सबसे भावुक हिस्सा दो बच्चों से जुड़ा है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, उस कथित नरसंहार में परिवार के दो छोटे बच्चे बच गए थे। बताया जाता है कि वे उस समय अपने ननिहाल गए हुए थे। बाद में उन्हें एक छाबड़े यानी टोकरी में बैठाकर वापस गांव लाया गया। इसी लोककथा के आधार पर उनके वंशजों को आगे चलकर ‘छाबड़िया’ गोत्र से जोड़ा जाता है। आज गांव में इस कथा को अपने पूर्वजों की स्मृति से जोड़कर देखा जाता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई गई इस कहानी ने रक्षाबंधन के दिन को भी परिवारों की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बना दिया। यह हिंदू-मुस्लिम लड़ाई नहीं, सत्ता की लड़ाई थी’ डॉ. रश्मी यादव इस कहानी को केवल धार्मिक या सामुदायिक संघर्ष के तौर पर नहीं देखतीं। उनका कहना है कि इसे हिंदू-मुस्लिम लड़ाई के रूप में नहीं, बल्कि उस दौर की सत्ता और सिंहासन की लड़ाई के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, तराईन का संघर्ष मूल रूप से सत्ता पर अधिकार को लेकर था और इतिहास की घटनाओं को आज के सामाजिक नजरिये से हिंदू-मुस्लिम संघर्ष के रूप में देखना उचित नहीं होगा।यह दृष्टिकोण इस कहानी को वर्तमान सामाजिक संदर्भ में एक अलग अर्थ देता है। सदियों पुरानी घटना की स्मृति आज भी जीवित है, लेकिन उसके अर्थ को लेकर आधुनिक पीढ़ी अपनी अलग समझ भी रखती है। रक्षाबंधन नहीं, भैयादूज पर मनता है भाई-बहन का पर्व सवाल यह है कि जब रक्षाबंधन नहीं मनाया जाता तो भाई-बहन के रिश्ते का उत्सव कैसे होता है? इसका जवाब है—भैयादूज।
स्थानीय लोगों के अनुसार, रक्षाबंधन की जगह भैयादूज को विशेष महत्व दिया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के घर जाती हैं, तिलक करती हैं और भाई-बहन के स्नेह का पर्व मनाती हैं। यानी यहां भाई-बहन के रिश्ते को नकारा नहीं गया है। सिर्फ रक्षाबंधन को लेकर एक अलग परंपरा बन गई है। राखी की जगह भैयादूज, लेकिन भाई-बहन का प्यार वही। आज भी कायम है परंपरा आधुनिक दौर में जहां गांवों की जीवनशैली तेजी से बदल रही है, वहीं सुराना में यह परंपरा अभी भी चर्चा में रहती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पूर्वजों के साथ हुई कथित त्रासदी की स्मृति इतनी गहरी है कि रक्षाबंधन का दिन उनके लिए सामान्य त्योहार जैसा नहीं रहा। कुछ ग्रामीणों में यह मान्यता भी बताई जाती है कि यदि इस दिन परंपरा तोड़कर राखी बांधी जाती है तो परिवार पर अनहोनी आ सकती है। हालांकि इस तरह की बातों को लोकविश्वास के रूप में ही देखा जाना चाहिए, इनके वैज्ञानिक या ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध होने की बात नहीं कही जा सकती। फिर भी किसी समाज की परंपरा को समझने के लिए सिर्फ प्रमाण ही नहीं, उसकी सामूहिक स्मृति को समझना भी जरूरी है। एटा की डॉ. रश्मी यादव के लिए यह सिर्फ परंपरा नहीं एटा की डॉ. रश्मी यादव के मामले में यह कहानी और दिलचस्प हो जाती है। वह पेशे से अधिवक्ता हैं और सामाजिक संस्था की सचिव के रूप में भी सक्रिय हैं। आधुनिक शिक्षा और पेशेवर जीवन के बावजूद वह अपने ससुराल और परिवार से जुड़ी इस परंपरा को निभाती हैं। उनका कहना है कि इस परंपरा को समझने के लिए इसे वर्तमान समय की धार्मिक लड़ाई के चश्मे से देखने के बजाय इतिहास, सत्ता संघर्ष और पारिवारिक स्मृतियों के संदर्भ में देखना चाहिए। यही वजह है कि एटा से जुड़ी डॉ. रश्मी यादव का नाम भी सुराना की इस अनोखी कहानी के साथ जुड़ गया है। त्योहार के पीछे छिपी एक सामूहिक स्मृति सुराना की कहानी कई सवाल खड़े करती है। क्या कोई सदियों पुरानी घटना किसी त्योहार की परंपरा बदल सकती है? क्या लोककथाएं पीढ़ियों तक किसी समुदाय की सामूहिक स्मृति को जिंदा रख सकती हैं? और क्या इतिहास को केवल किताबों में ही खोजा जा सकता है? सुराना इन सवालों के बीच खड़ा नजर आता है। यहां रक्षाबंधन के दिन देश के बाकी हिस्सों जैसी रौनक नहीं दिखती। लेकिन इसका मतलब भाई-बहन के रिश्ते का कमजोर होना नहीं है। भैयादूज के दिन वही बहनें भाइयों के घर जाती हैं और वही स्नेह फिर दिखाई देता है। यानी तारीख बदली, रस्म बदली, लेकिन रिश्ता नहीं बदला। रक्षाबंधन के दिन जब देशभर की कलाई पर राखियां सजती हैं, उसी समय सुराना की कुछ कलाईयां खाली रहती हैं। उन खाली कलाईयों के पीछे कोई आज का विवाद नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के अनुसार सदियों पुरानी एक ऐसी कहानी है, जिसे पीढ़ियां अपने साथ लेकर चलती आ रही हैं। सुराना की यह कहानी इस बात की मिसाल है कि भारत में त्योहार सिर्फ उत्सव नहीं होते। कई बार उनके साथ इतिहास, लोकविश्वास, पारिवारिक स्मृतियां और पूर्वजों की कहानियां भी जुड़ी होती हैं। और शायद यही वजह है कि रक्षाबंधन के दिन सुराना में राखी नहीं बंधती लेकिन भाई-बहन का रिश्ता आज भी उतना ही मजबूत है।

रिपोर्टर  : लखन यादव

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