आसरेली वन परिक्षेत्र में वन विभाग पर बड़ा सवाल

गडचिरोली - सागवान तस्करी के कथित नेटवर्क पर शिकंजा! क्षेत्र सहायक विनोद गोलेवार निलंबित, CCF जी.पी. नरवाने की कार्रवाई से वन विभाग में हड़कंप CDR में कथित संदिग्ध संपर्कों का दावा; तेलंगाना–महाराष्ट्र–छत्तीसगढ़ तक फैले तस्करी कनेक्शन की आशंका — क्या जंगल के भीतर से ही मिल रही थी तस्करों को ‘इनसाइड जानकारी’? गडचिरोली के आसरेली वन परिक्षेत्र में आखिर ऐसा क्या चल रहा था कि एक के बाद एक अधिकारी और कर्मचारी कार्रवाई की जद में आ रहे हैं? बहुमूल्य सागवान की कथित अवैध कटाई और तस्करी को लेकर पहले से सवालों के घेरे में रहे आसरेली वन परिक्षेत्र में अब क्षेत्र सहायक विनोद गोलेवार के निलंबन ने पूरे वन विभाग में खलबली मचा दी है।

बताया जा रहा है कि मुख्य वन संरक्षक (CCF) जी.पी. नरवाने ने गोलेवार के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की है। उन पर कथित तौर पर सागवान तस्करी से जुड़े लोगों के साथ सांठगांठ, विभाग को गुमराह करने तथा आसरेली से लेकर झिंगानूर वन परिक्षेत्र तक में सागवान की अवैध कटाई/बिक्री/तस्करी में सहयोग करने जैसे गंभीर आरोपों की जांच चल रही है। हालांकि, इन आरोपों की अंतिम पुष्टि विभागीय जांच पूरी होने के बाद ही होगी।  सवाल बड़ा है—क्या जंगल के अंदर से ही चल रहा था खेल? सागवान तस्करी कोई छोटी-मोटी चोरी नहीं है। जंगल से पेड़ काटना, उसे बाहर निकालना, परिवहन करना और फिर दूसरे क्षेत्रों या राज्यों में खपाना—इस पूरी प्रक्रिया के पीछे एक संगठित नेटवर्क की जरूरत होती है।

यही वजह है कि क्षेत्र सहायक के निलंबन के बाद अब सवाल सिर्फ “विनोद गोलेवार ने क्या किया?” तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ा सवाल है क्या किसी अंदरूनी व्यक्ति की मदद के बिना इतने बड़े पैमाने पर सागवान की कथित तस्करी संभव थी? क्या तस्करों को वन विभाग की गश्त, कार्रवाई और जांच से जुड़ी अंदरूनी जानकारी मिलती थी? क्या इस पूरे मामले में और भी लोग जांच के दायरे में आएंगे? इन सवालों के जवाब अब विभागीय जांच से सामने आने की उम्मीद है। CDR ने बढ़ाया सस्पेंस—किससे हो रही थी बातचीत? मामले में सबसे ज्यादा चर्चा कॉल डिटेल रिकॉर्ड यानी CDR को लेकर है।

दावा किया जा रहा है कि जांच के दौरान क्षेत्र सहायक के कथित संपर्कों की पड़ताल की गई और तेलंगाना, महाराष्ट्र तथा छत्तीसगढ़ से जुड़े कुछ संदिग्ध लोगों के साथ संपर्क सामने आने की बात कही जा रही है। अगर जांच में इन संपर्कों और कथित वन अपराधों के बीच कोई ठोस संबंध स्थापित होता है, तो मामला बेहद गंभीर रूप ले सकता है। लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि सिर्फ फोन पर संपर्क होना अपराध का प्रमाण नहीं है। संपर्क किस उद्देश्य से थे और उनका सागवान तस्करी से कोई संबंध था या नहीं—इसकी पुष्टि जांच के बाद ही संभव है।

 आसरेली में कार्रवाई का सिलसिला क्यों नहीं रुक रहा? आसरेली वन परिक्षेत्र पहले भी विभागीय कार्रवाई और विवादों के कारण चर्चा में रहा है। जानकारी के अनुसार, इससे पहले भी यहां दो क्षेत्र सहायकों और एक वन परिक्षेत्र अधिकारी के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई हो चुकी है। अब फिर एक क्षेत्र सहायक पर कार्रवाई ने विभागीय निगरानी व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।अगर बार-बार एक ही वन क्षेत्र से विभागीय कार्रवाई की खबरें सामने आती हैं, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है—आखिर निगरानी व्यवस्था में कमी कहां है? जंगल की सुरक्षा में चूक कौन कर रहा है? और अगर तस्करी का नेटवर्क सक्रिय है, तो उसकी जड़ तक कब पहुंचा जाएगा?  वन परिक्षेत्राधिकारी को जान से मारने की धमकी का भी आरोप मामले में एक और गंभीर आरोप सामने आया है। क्षेत्र सहायक विनोद गोलेवार पर वन परिक्षेत्राधिकारी शिवाजी पानगे को कथित तौर पर शराब के नशे में गोली मारकर जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाया जा रहा है।

यदि यह आरोप सही पाया जाता है, तो यह मामला केवल वन विभाग की अनुशासनात्मक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगा।हालांकि, कथित घटना की परिस्थितियां, प्रत्यक्षदर्शी, उपलब्ध साक्ष्य तथा इस संबंध में हुई पुलिस अथवा विभागीय कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि अभी जांच का विषय है। सागवान की कथित तस्करी—अब बड़े नेटवर्क की जांच जरूरी आसरेली और झिंगानूर क्षेत्र में सागवान की कथित अवैध कटाई और तस्करी को लेकर उठते सवालों के बीच अब विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती है पूरे नेटवर्क की पहचान करना। अगर किसी कर्मचारी की भूमिका जांच में साबित होती है, तो यह पता लगाना भी जरूरी होगा कि—

पेड़ किसने काटे? लकड़ी जंगल से किसने बाहर निकाली? परिवहन किसके माध्यम से हुआ? लकड़ी कहां पहुंचाई गई? किसने खरीदी? और इस पूरे नेटवर्क को कथित तौर पर संरक्षण या अंदरूनी जानकारी कौन उपलब्ध करा रहा था? इन सवालों की निष्पक्ष जांच होने पर ही तस्वीर साफ होगी।  सिर्फ निलंबन नहीं—अब ‘पूरे नेटवर्क’ की बारी? क्षेत्र सहायक के निलंबन के बाद वन विभाग की कार्रवाई पर नजरें टिक गई हैं। यदि आरोप जांच में सही साबित होते हैं, तो सवाल उठेगा कि क्या कार्रवाई केवल एक कर्मचारी तक सीमित रहेगी या कथित नेटवर्क के अन्य सदस्यों तक भी जांच पहुंचेगी?

विशेषकर तेलंगाना–महाराष्ट्र–छत्तीसगढ़ से जुड़े कथित संपर्कों की जांच, CDR की तकनीकी पड़ताल, वन अपराधों के पुराने मामलों की समीक्षा तथा सागवान की जब्ती और परिवहन से जुड़े रिकॉर्ड की जांच से कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। आसरेली के जंगलों से अब कौन-कौन से राज निकलेंगे? क्षेत्र सहायक विनोद गोलेवार के निलंबन ने आसरेली वन परिक्षेत्र को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। अब सवाल सिर्फ एक निलंबन का नहीं है। सवाल है—जंगल की रखवाली करने वालों में से अगर किसी पर ही जंगल की संपदा को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगे, तो जवाबदेही किसकी तय होगी? सवाल है—अगर CDR में कथित संदिग्ध संपर्क सामने आए हैं, तो उन संपर्कों की पूरी जांच कब होगी? सवाल है—क्या सागवान तस्करी की कथित पूरी चेन तक जांच पहुंचेगी? और सबसे बड़ा सवाल— “क्या आसरेली के जंगल में सिर्फ पेड़ ही कट रहे थे, या फिर वन विभाग की निगरानी व्यवस्था में भी सेंध लग चुकी थी?”अब निगाहें CCF जी.पी. नरवाने की आगे की कार्रवाई, विभागीय जांच और जांच के अंतिम निष्कर्ष पर टिकी हैं। यदि जांच निष्पक्ष और व्यापक तरीके से आगे बढ़ती है, तो आने वाले दिनों में सागवान तस्करी के कथित नेटवर्क से जुड़े कई चेहरे बेनकाब होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।


रिपोर्टर — चंद्रशेखर पुलगम

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