शहीदों की आहुति भुलाकर भूपति को ‘मार्गदर्शक’ पद

गड़चिरोली - ने दशकों तक नक्सली हिंसा का दर्द झेला है। सैकड़ों जवान शहीद हुए, निर्दोष नागरिक मारे गए और अनेक परिवार उजड़ गए। विकास कार्य भी लंबे समय तक प्रभावित रहे।

इसी पृष्ठभूमि में पूर्व माओवादी केंद्रीय समिति सदस्य और पोलिट ब्यूरो सदस्य मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति को गोंडवाना विश्वविद्यालय के ‘एकल’ उपक्रम में समन्वयक बनाए जाने की खबर सामने आई है। अक्टूबर 2025 में उन्होंने करीब 60 साथियों के साथ आत्मसमर्पण किया था। नक्सलवाद छोड़कर मुख्यधारा में आने वालों का पुनर्वास सरकार की नीति हो सकती है। लेकिन पुनर्वास और सार्वजनिक संस्था में मार्गदर्शन की जिम्मेदारी देना अलग-अलग विषय हैं। बताया जा रहा है कि भूपति आदिवासी ग्रामसभाओं को पेसा, वनाधिकार और प्रशासन के समन्वय के संबंध में मार्गदर्शन करेंगे। ऐसे में सवाल है—क्या ग्रामसभाओं और स्थानीय जनता की राय ली गई?

जिन लोगों ने कभी लोकतांत्रिक व्यवस्था और सरकारी तंत्र के खिलाफ हथियार उठाए, क्या उन्हीं से अब ग्रामसभाओं को लोकतंत्र का मार्गदर्शन दिलाना उचित है? यह सवाल उनके पुनर्वास का विरोध नहीं, बल्कि जनविश्वास और पीड़ितों के सम्मान का है। गड़चिरोली में नक्सली हिंसा के कारण जिन परिवारों ने अपने पिता, बेटे या पति खोए, उनके लिए रोजगार, मुआवजा और न्याय आज भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। सरकार को यह भी बताना चाहिए कि शहीद जवानों और हिंसा में मारे गए नागरिकों के परिवारों के लिए क्या किया गया। वहीं, नक्सलवाद के दौर में ‘खबरी’ बताकर मारे गए लोगों और झूठे आरोपों में जेल गए नागरिकों के मामलों की भी निष्पक्ष कानूनी समीक्षा जरूरी है।

धर्मराव बाबा आत्राम के 1991 के अपहरण जैसी घटनाएं भी गड़चिरोली के नक्सली इतिहास का हिस्सा हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में इस घटना के पीछे नक्सली नेता देवजी का नाम आता है; इसे भूपति से जोड़ने का ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं दिखता। लेकिन यह घटना बताती है कि उस दौर में जनप्रतिनिधि भी सुरक्षित नहीं थे। आज गड़चिरोली विकास की राह पर है, लेकिन सवाल कायम है—चार दशकों की हिंसा से हुए सामाजिक और विकासात्मक नुकसान का हिसाब कौन देगा?

भूपति को नई जिंदगी का अवसर मिलना चाहिए या नहीं, यह अलग विषय है। आत्मसमर्पण और पुनर्वास शांति प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं। लेकिन यदि उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला है तो उसका फैसला कानून के अनुसार होना चाहिए और पीड़ितों को न्याय मिलना चाहिए। नक्सलवाद खत्म करना सिर्फ बंदूकें शांत करना नहीं है। इसका अर्थ है हिंसा में उजड़े परिवारों को न्याय, गांवों को विकास, बच्चों को शिक्षा, युवाओं को रोजगार और लोकतंत्र पर जनता का विश्वास देना। इसलिए सरकार को भूपति के पुनर्वास के साथ-साथ शहीदों और नक्सली हिंसा के पीड़ितों के सम्मान और न्याय को भी समान प्राथमिकता देनी चाहिए।

आत्मसमर्पण का स्वागत हो सकता है, लेकिन हिंसा के इतिहास को भुलाकर सार्वजनिक जिम्मेदारी देने से पहले पीड़ितों के घावों को जरूर याद रखना चाहिए।

रिपोर्टर - प्रशांत नामनवार

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