चिंकारा शिकार मामले में धर्मरावबाबा आत्राम समेत आठों आरोपी बरी
गडचिरोली - जिले के अहेरी विधानसभा क्षेत्र के मौजूदा विधायक तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता धर्मरावबाबा आत्राम को 18 साल पुराने चर्चित चिंकारा शिकार मामले में बड़ी कानूनी राहत मिली है। पुणे जिले के सासवड स्थित प्रथम वर्ग न्यायिक दंडाधिकारी न्यायालय ने धर्मरावबाबा आत्राम समेत मामले के सभी आठ आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने 4 अगस्त 2026 को दिए अपने आदेश में अभियोजन पक्ष की लगातार निष्क्रियता और गवाहों की मौजूदगी सुनिश्चित करने में विफलता को कार्यवाही समाप्त करने का प्रमुख आधार माना। अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 247 के तहत मामले की कार्यवाही समाप्त करते हुए आरोपियों को लगाए गए आरोपों से बरी करने का आदेश दिया। यह मामला वर्ष 2008 में दर्ज किया गया था और करीब 18 वर्षों से न्यायालय में लंबित था।
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 14 जून 2008 को पुणे जिले के भोर और बारामती तहसील की सीमा से लगे चौधरवाड़ी क्षेत्र में दो चिंकारा हिरण और दो खरगोशों के कथित शिकार का मामला सामने आया था। वन विभाग की ओर से की गई शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया गया। प्रकरण में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 9, 39, 40, 50, 51 और 52 तथा भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 26(i) के तहत कार्रवाई की गई थी। मामले की जांच तत्कालीन उपविभागीय वन अधिकारी हनुमंत धुमाळ ने की थी। जांच के बाद करीब 900 पन्नों का आरोपपत्र दाखिल किया गया था, जिसमें 95 सरकारी गवाहों का उल्लेख होने की जानकारी सामने आई थी।
आठ लोगों के खिलाफ था मामला
मामले में धर्मरावबाबा आत्राम समेत कुल आठ लोगों को आरोपी बनाया गया था— सुरेश आनंदराव बिरामणे,रवींद्र तुकाराम वाडकर, महेश आनंदराव बिरामणे, रवी वसंत सोरप, अंकुश तुकाराम सानस, प्रभाकर श्रीराम वाघ,धर्मराव भगवंतराव आत्राम सय्यद अली हुसेन आरोपियों की ओर से अधिवक्ता चंद्रशेखर जाधव और ए. ई. भारंबे ने न्यायालय में पैरवी की।
गवाहों की गैरहाजिरी से वर्षों तक अटका रहा मामला
मामला दर्ज होने के बाद इसकी सुनवाई अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी। बचाव पक्ष ने जांच अधिकारी द्वारा दर्ज किए गए कुछ बयानों पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद मामला जिला न्यायालय और आगे मुंबई उच्च न्यायालय तक पहुंचा। कानूनी प्रक्रिया और जांच अधिकारी के बयान से जुड़े विवाद के कारण भी मामले में विलंब हुआ। परिणामस्वरूप 2008 में दर्ज हुआ मुकदमा लंबे समय तक लंबित रहा। अभियोजन पक्ष को बार-बार मिला मौका, फिर भी नहीं पेश हुए गवाह
सासवड न्यायालय ने अपने आदेश में अभियोजन पक्ष की भूमिका पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत के अनुसार, यह पुलिस रिपोर्ट के अलावा अन्य तरीके से दाखिल किया गया वारंट केस था। ऐसी स्थिति में शिकायतकर्ता अथवा अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने गवाहों को न्यायालय में उपस्थित कराए और उनकी गवाही दर्ज कराने के लिए आवश्यक कदम उठाए। अदालत के अनुसार, वन विभाग की ओर से मामले की पैरवी के लिए अधिवक्ता नियुक्त किया गया था, लेकिन वह लंबे समय तक अनुपस्थित रहा। इसके बावजूद अभियोजन पक्ष की ओर से गवाहों को न्यायालय में पेश करने के लिए प्रभावी प्रयास नहीं किए गए।
अदालत ने 10 अप्रैल 2026 को मामले को खारिज करने संबंधी उचित आदेश के लिए रखने के निर्देश दिए थे। इसके बाद भी अभियोजन पक्ष को 14 मई, 24 जून, 7 जुलाई और 21 जुलाई 2026 को अवसर दिया गया। लेकिन इन अवसरों के बावजूद गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित नहीं हो सकी।
‘केवल प्रशासनिक पत्राचार के आधार पर मुकदमा लंबित नहीं रखा जा सकता’
विशेष सरकारी वकील की ओर से अदालत को बताया गया कि मामले में प्रभावी कार्रवाई के लिए आवश्यक निर्देश और अधिकृत सूचना उपलब्ध नहीं थी। इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल विभागीय या प्रशासनिक पत्राचार के कारण आपराधिक कार्यवाही को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा कि 2008 से लंबित मामले में आरोपियों को उचित समय के भीतर आपराधिक कार्यवाही के तार्किक निष्कर्ष का अधिकार है। अभियोजन पक्ष को पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद यदि वह गवाहों को पेश करने और मामले को आगे बढ़ाने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाता है, तो कार्यवाही अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रखी जा सकती।
2008 में राजनीतिक गलियारों में मची थी हलचल
चिंकारा शिकार के आरोपों ने वर्ष 2008 में महाराष्ट्र की राजनीति में काफी हलचल पैदा कर दी थी। उस समय धर्मरावबाबा आत्राम राज्य सरकार में मंत्री थे। अभियोजन पक्ष के कथन के अनुसार, चौधरवाड़ी क्षेत्र में रात के समय कुछ वाहन देखे गए थे। ग्रामीणों ने गोली चलने की आवाज सुनने का दावा किया था और वाहनों के नंबर नोट किए जाने के बाद मामला सामने आया था। बाद में वन विभाग ने जांच शुरू की। अभियोजन पक्ष के अनुसार, जांच के दौरान वाहनों और कथित वन्यजीव अवशेषों से संबंधित साक्ष्य जुटाए गए थे। हालांकि धर्मरावबाबा आत्राम ने शुरुआत से ही शिकार के आरोपों से इनकार किया था। इस मामले के राजनीतिक प्रभाव के बीच उस समय आत्राम को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। बाद में उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था।
चिंकारा संरक्षित वन्यजीव
चिंकारा वन्यजीव (संरक्षण) कानून के तहत संरक्षित वन्यजीव है। अभिनेता सलमान खान से जुड़े चिंकारा शिकार मामले के कारण भी चिंकारा के शिकार का मुद्दा देशभर में चर्चा में रहा है। इसी कारण आत्राम से जुड़ा यह मामला भी उस समय काफी सुर्खियों में रहा था।
बरी होने के बाद आत्राम के राजनीतिक भविष्य पर नजर
सासवड न्यायालय के फैसले के बाद धर्मरावबाबा आत्राम के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी चर्चाएं तेज हो सकती हैं। उनके समर्थकों की ओर से पहले ही मंत्रिपद की मांग की जाती रही है। ऐसे में इस कानूनी राहत के बाद मंत्रिपद को लेकर चल रही मांग को राजनीतिक बल मिलने की संभावना जताई जा रही है।
अहेरी में 2024 में दर्ज की थी जीत
धर्मरावबाबा आत्राम वर्तमान में गडचिरोली जिले के अहेरी विधानसभा क्षेत्र के विधायक हैं। वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव में अहेरी में मुकाबला विशेष रूप से चर्चित रहा था। आत्राम के सामने उनकी बेटी भाग्यश्री आत्राम ने शरद पवार गुट की ओर से चुनाव लड़ा था, जबकि उनके भतीजे राजे अंबरीशराव आत्राम निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में थे। इस चुनाव में धर्मरावबाबा आत्राम को 53,978 वोट, भाग्यश्री आत्राम को 35,569 वोट और राजे अंबरीशराव आत्राम को 37,121 वोट मिले थे। आत्राम ने चुनाव में जीत दर्ज की थी। इससे पहले 2019 के विधानसभा चुनाव में भी धर्मरावबाबा आत्राम अहेरी से विजयी हुए थे। उन्हें उस चुनाव में 60,013 वोट मिले थे।
फैसले का मुख्य आधार
सासवड न्यायालय के आदेश का मूल आधार अभियोजन पक्ष की ओर से मामले को आगे बढ़ाने में लगातार रही निष्क्रियता है। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष को पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित नहीं की गई और मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए। इसलिए धर्मरावबाबा आत्राम समेत सभी आठ आरोपियों को बरी करते हुए न्यायालय ने 2008 से लंबित इस मामले की कार्यवाही समाप्त कर दी।
महत्वपूर्ण: यह बरी होना न्यायालय द्वारा मूल शिकार के आरोपों को सही ठहराने वाला फैसला नहीं है। अदालत का आदेश मुख्य रूप से अभियोजन पक्ष द्वारा गवाह पेश करने और कार्यवाही आगे बढ़ाने में लगातार विफल रहने तथा मामले के अत्यधिक लंबे समय से लंबित रहने पर आधारित है।
रिपोर्टर - संजय यमसलवार
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