550 वर्ष पुरानी हवेली संगीत परंपरा को मिला राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान
गांधीनगर : राकेश शाह भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्राचीन एवं समृद्ध परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले पुष्टिमार्गीय हवेली संगीत को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त हुआ है। केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन कार्यरत संगीत नाटक अकादमी द्वारा वर्ष 2024 -25 के लिए घोषित उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार- 2025 के लिए अहमदाबाद के कालुपुर स्थित गोस्वामी हवेली की 16वीं पीढ़ी के आचार्य तथा हवेली संगीत के विद्वान आचार्य श्री रणछोडलालजी गोस्वामी का चयन किया गया है।
आचार्य रणछोडलालजी गोस्वामी इस सम्मान को अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि से अधिक संपूर्ण हवेली संगीत परंपरा का गौरव मानते हैं। वे कहते हैं, "यह पुरस्कार भारत की भक्ति, संगीत और संस्कृति की समृद्ध परंपरा को मिला सम्मान है। हवेली संगीत में भारत की आत्मा बसती है।”
पुष्टिमार्ग की स्थापना महाप्रभु श्री वल्लभाचार्यजी ने लगभग 550 वर्ष पहले की थी। इस परंपरा में कीर्तन और संगीत को भक्ति का सर्वोच्च साधन माना जाता है। आज भी हवेलियों में दिन के विभिन्न प्रहरों तथा ऋतुओं के अनुरूप विशिष्ट रागों में सेवा-कीर्तन किया जाता है। वसंत, ग्रीष्म, श्रावण अथवा शरद; प्रत्येक ऋतु के लिए अलग संगीत परंपरा विकसित की गई है, जो हवेली संगीत को विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।
अहमदाबाद के 450 वर्ष पुराने दोषीवाडा की पोल स्थित गोस्वामी हवेली के आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित रणछोडलालजी गोस्वामी ने गुरु-शिष्य परंपरा में संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त किया है। साथ ही उन्होंने गुजरात यूनिवर्सिटी के उपासना स्कूल ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स से संगीत विषय में स्नातकोत्तर एवं एमफिल पूर्ण किया है तथा वर्तमान में पीएचडी शोधकार्य कर रहे हैं।
मात्र 32 वर्ष की आयु में उन्होंने 22 हजार से अधिक भक्तिपदों की रचना की है तथा आठ पुस्तकों का सृजन किया है। वे गुजरात यूनिवर्सिटी के हवेली संगीत पाठ्यक्रम में विशेषज्ञ के रूप में भी सेवाएं दे रहे हैं। ब्रजभाषा, गुजराती, संस्कृत के अतिरिक्त चारणी, मेवाड़ी और मारवाड़ी जैसी भाषाओं में भी उनकी रचनाएं उपलब्ध हैं।
आचार्य के अनुसार हवेली संगीत भारतीय शास्त्रीय संगीत का मूल स्वरूप है। प्रबंध, ध्रुपद और धमार जैसी प्राचीन गायन परंपराओं से ही आगे चलकर खयाल गायकी का विकास हुआ है। हवेली संगीत में आज भी ये मूल परंपराएं जीवंत हैं।
वे कहते हैं कि महाप्रभु श्री वल्लभाचार्यजी तथा श्री विट्ठलनाथजी के समय से सूरदास, परमानंददास सहित अष्टछाप के कवियों की रचनाएं हवेली संगीत के माध्यम से गाई जाती रही हैं। यह संगीत केवल कला का स्वरूप नहीं, बल्कि भक्ति और उपासना का जीवंत माध्यम है। आचार्य का मानना है कि यह पुरस्कार संपूर्ण वैष्णव समाज तथा शास्त्रीय संगीत प्रेमियों के लिए गौरव का क्षण है। गुजरात और राजस्थान के अलावा मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र तथा पंजाब में भी यह परंपरा आज जीवंत है। स्वतंत्रता के बाद हवेली संगीत को इतने उच्च राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त होने की यह संभवतः पहली घटना है।
हवेली संगीत के संरक्षण के संबंध में वे सुझाव देते हैं कि यूनिवर्सिटी स्तर पर पूर्णकालिक पाठ्यक्रम प्रारंभ किए जाने चाहिए। आधिकारिक ग्रंथों का सृजन, अनुसंधान, दस्तावेजीकरण तथा तुलनात्मक अध्ययन को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। साथ ही युवा पीढ़ी में इस परंपरा के प्रति रुचि जागृत हो, इसके लिए सेमिनार, कार्यशालाओं तथा व्याख्यानमालाओं का आयोजन भी समय की आवश्यकता है।
पांच शताब्दियों से अधिक समय से मंदिरों की दीवारों में गूंजता हवेली संगीत का स्वर अब राष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुका है। यह सम्मान केवल एक कलाकार का नहीं, बल्कि भारत की अमूल्य संगीत विरासत का गौरव बढ़ाने वाला एक मील का पत्थर बन गया है।
रिपोर्टर : राकेश शाह
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