राजनीति ही एकमात्र ऐसा पेशा है जहाँ आप झूठ बोल सकते हैं, धोखा दे सकते हैं, फिर भी सम्मानित बने रह सकते हैं

गुजरात - “राजनीति ही एकमात्र ऐसा पेशा है जहाँ आप झूठ बोल सकते हैं”—यह कथन अक्सर लोगों के बीच सुनने को मिलता है। चुनावी रैलियों, टेलीविजन की बहसों और सोशल मीडिया पर नेताओं के वादों एवं बयानों को देखकर कई बार लोगों को ऐसा महसूस होता है कि राजनीति में झूठ बोलना एक सामान्य बात बन गई है। लेकिन क्या वास्तव में राजनीति केवल झूठ का दूसरा नाम है? या फिर कुछ नेताओं के आचरण के कारण ऐसी धारणा बनी है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए राजनीति की प्रकृति, उसके उद्देश्य और उसके व्यवहारिक पक्ष को समझना आवश्यक है।

राजनीति का मूल उद्देश्य समाज और राष्ट्र का कल्याण करना है। लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है ताकि वे उनकी समस्याओं का समाधान करें, देश के विकास के लिए नीतियाँ बनाएँ और न्यायपूर्ण शासन प्रदान करें। लेकिन जब सत्ता प्राप्त करना ही सर्वोच्च लक्ष्य बन जाता है, तब नैतिकता पीछे छूटने लगती है। ऐसी स्थिति में झूठ, भ्रम, आधे-अधूरे सच और खोखले वादे राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं।

चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। मुफ्त सुविधाएँ, रोजगार, किसानों की आय दोगुनी करने, भ्रष्टाचार समाप्त करने और महँगाई पर नियंत्रण जैसे अनेक आश्वासन दिए जाते हैं। चुनाव समाप्त होने के बाद इनमें से कई वादे पूरे नहीं हो पाते। परिणामस्वरूप जनता के मन में यह धारणा और मजबूत होती जाती है कि राजनीति में झूठ बोलना मानो स्वीकार्य हो गया है।

उदाहरण 1:
यदि कोई नेता चुनाव से पहले हर युवा को नौकरी देने का वादा करे, जबकि उसे स्वयं पता हो कि वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में ऐसा कर पाना संभव नहीं है, तो ऐसा वादा जनता को भ्रमित करने वाला माना जा सकता है। ऐसे उदाहरण अनेक देशों और राज्यों की राजनीति में समय-समय पर देखने को मिलते हैं।

उदाहरण 2:
कई बार राजनीतिक दल अपने विरोधियों के विरुद्ध पर्याप्त प्रमाण के बिना आरोप लगाते हैं, ताकि जनता की राय को प्रभावित किया जा सके। बाद में जाँच के दौरान यदि वे आरोप गलत सिद्ध होते हैं, तो इससे राजनीतिक व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास और कमजोर होता है।

हालाँकि, यह कहना भी उचित नहीं होगा कि राजनीति केवल झूठ का ही पेशा है। इतिहास ऐसे अनेक नेताओं से भरा पड़ा है जिन्होंने सत्य, ईमानदारी और नैतिकता को अपनी राजनीति का आधार बनाया।

उदाहरण 3:
महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा को अपनी राजनीति का आधार बनाया। उन्होंने सत्ता प्राप्त करने के लिए झूठ और छल का सहारा लेने के बजाय नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता दी। उनका मानना था कि राजनीति को नैतिकता से अलग नहीं किया जा सकता।

उदाहरण 4:
लाल बहादुर शास्त्री अपनी ईमानदारी, सादगी और कर्तव्यनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध थे। “जय जवान, जय किसान” केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि देश के सैनिक और किसान के प्रति सम्मान तथा जिम्मेदारी की भावना का प्रतीक था। आज सोशल मीडिया के दौर में झूठ और भ्रामक जानकारी पहले से कहीं अधिक तेजी से फैलती है। कई बार अधूरी,गलत या भ्रामक जानकारी राजनीतिक लाभ के लिए साझा की जाती है। इसलिए नागरिकों की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है कि वे किसी भी सूचना पर विश्वास करने से पहले उसकी सत्यता और विश्वसनीयता की जाँच करें।

राजनीति में झूठ का सबसे बड़ा नुकसान जनता के विश्वास का टूटना है। जब नागरिकों को बार-बार ऐसा महसूस होता है कि उनके साथ वादों के नाम पर छल किया जा रहा है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास कमजोर हो सकता है। लोगों में व्यवस्था के प्रति निराशा, असंतोष और राजनीतिक उदासीनता बढ़ सकती है।

इसके विपरीत, यदि राजनीति सत्य, पारदर्शिता और जवाबदेही पर आधारित हो, तो लोकतंत्र मजबूत होता है। जनता और सरकार के बीच विश्वास बढ़ता है, विकास कार्य अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ सकते हैं और समाज में सकारात्मक वातावरण बनता है।

इसलिए यह कहना कि “राजनीति ही एकमात्र ऐसा पेशा है जहाँ आप झूठ बोल सकते हैं” पूरी तरह सही नहीं है। झूठ किसी भी क्षेत्र—व्यवसाय, विज्ञापन, खेल, शिक्षा या व्यक्तिगत जीवन—में हो सकता है। अंतर केवल इतना है कि राजनीति में बोले गए झूठ का प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लाखों-करोड़ों लोगों के जीवन, नीतियों और देश की दिशा पर पड़ सकता है। यही कारण है कि राजनीतिक झूठ अधिक गंभीर और अधिक चर्चा का विषय बन जाता है।

निष्कर्ष

राजनीति स्वयं बुरी नहीं है; उसे अच्छा या बुरा बनाने वाले लोग और उनका आचरण होते हैं। यदि राजनीतिक नेतृत्व ईमानदार, जवाबदेह और जनहित के प्रति समर्पित हो, तो राजनीति समाज परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली माध्यम बन सकती है। इसलिए आवश्यकता राजनीति को झूठ का पर्याय मानने की नहीं, बल्कि ऐसी राजनीति को बढ़ावा देने की है जो सत्य, नैतिकता, पारदर्शिता और जनसेवा के सिद्धांतों पर आधारित हो। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति तभी बनी रहेगी जब नेता अपने वचनों का सम्मान करेंगे और नागरिक भी जागरूक होकर सही प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे।

अंत में कुछ पंक्तियाँ—

वचन केवल शब्दों में नहीं, आचरण में दिखाई देने चाहिए,
राजनीति में सत्ता नहीं, संस्कार दिखाई देने चाहिए।
जनता तो विश्वास करके सौंपती है देश की बागडोर,
हर निर्णय में उस विश्वास का सम्मान दिखाई देना चाहिए।

*क्योंकि लोकतंत्र में कुर्सी बड़ी नहीं होती,
कुर्सी पर बैठने वाले की जिम्मेदारी बड़ी होती है।*

पत्रकार - चंद्रकांत सी पूजारी 

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