महारेरा ने कुमार प्रॉपर्टीज की पुनर्विचार याचिका खारिज की, कहा– समीक्षा अपील का विकल्प नहीं

हवेली : महाराष्ट्र रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (महारेरा) ने डेवलपर कुमार प्रॉपर्टीज एंड डेवलपर्स एलएलपी द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है। प्राधिकरण ने स्पष्ट किया कि समीक्षा याचिका का उपयोग किसी मामले पर दोबारा बहस करने या अपील के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता।

महारेरा के अध्यक्ष मनोज सौनिक द्वारा 9 जुलाई 2026 को पारित आदेश में 30 अप्रैल 2026 के पूर्व आदेश को बदलने की मांग अस्वीकार कर दी गई। मूल आदेश में डेवलपर को धारा 18, रेरा अधिनियम 2016 के तहत घर खरीदार पायल हलदार को विलंबित कब्जे पर ब्याज भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।

यह विवाद महारेरा पंजीकरण संख्या P52100024598 के अंतर्गत पंजीकृत “कुमार प्रॉपर्टीज” परियोजना के एक फ्लैट से संबंधित है।

डेवलपर के तर्क
कुमार प्रॉपर्टीज एंड डेवलपर्स एलएलपी ने पुनर्विचार याचिका में निम्न आधार प्रस्तुत किए:

अनुग्रह अवधि (Grace Period): बिक्री समझौते में 28 मार्च 2025 की कब्जा तिथि के साथ छह माह की अतिरिक्त अवधि का प्रावधान था, जिसे प्राधिकरण ने कथित तौर पर अंतिम आदेश में नहीं माना।
सॉफ्ट पजेशन: डेवलपर ने दावा किया कि खरीदार ने 30 जून 2025 को आंतरिक कार्यों के लिए फ्लैट का “सॉफ्ट पजेशन” ले लिया था, इसलिए उसके बाद ब्याज देय नहीं होना चाहिए।
पार्ट ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट: 27 मार्च 2026 को प्राप्त प्रमाणपत्र को वैधानिक तैयारी का प्रमाण बताया गया।
सुनवाई में अनुपस्थिति: अंतिम सुनवाई में अनुपस्थित रहने के कारण कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेजों पर विचार नहीं हो सका और रिकॉर्ड पर स्पष्ट त्रुटि रह गई।

घर खरीदार का विरोध
पायल हलदार ने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर पुनर्विचार याचिका का विरोध किया और इसे “विलंब की रणनीति” बताया। उन्होंने कहा:

समझौते के अनुसार कब्जा 28 मार्च 2025 तक दिया जाना था।
30 जून 2025 को केवल इंटीरियर कार्य हेतु अस्थायी प्रवेश दिया गया था, पूर्ण कब्जा नहीं।
कब्जे की तिथि को बार-बार जून, सितंबर, दिसंबर 2025 और फरवरी 2026 तक आगे बढ़ाया गया।
बाद में प्राप्त पार्ट ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट से विलंब की अवधि समाप्त नहीं होती।
याचिका में रिकॉर्ड पर कोई वास्तविक “स्पष्ट त्रुटि” नहीं दर्शाई गई है।

महारेरा की टिप्पणी
अध्यक्ष मनोज सौनिक ने महारेरा (सामान्य) विनियम, 2017 के नियम 36 का हवाला देते हुए कहा कि समीक्षा तभी स्वीकार्य है जब कोई नया और महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आए या रिकॉर्ड पर स्पष्ट त्रुटि हो।

“समीक्षा अधिकार क्षेत्र में मामले को दोबारा नहीं खोला जा सकता और न ही उसके गुण-दोष पर पुनः सुनवाई की जा सकती है।”

उन्होंने कहा कि यदि डेवलपर आदेश से असंतुष्ट है तो उचित उपाय रियल एस्टेट अपीलीय न्यायाधिकरण में अपील करना है, न कि अनुचित पुनर्विचार याचिका दायर करना।

अंतिम निर्णय
महारेरा ने निष्कर्ष निकाला कि डेवलपर नियम 36 की आवश्यक शर्तों को पूरा करने में विफल रहा है। इसलिए पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी गई। मामले में लागत संबंधी कोई आदेश पारित नहीं किया गया।

संवादाता : यश सोलंकी 

 

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