शासन की लाखों की योजना हुई बेकार, श्मशान घाटों के टीनशेड उड़ गए, अंतिम संस्कार पर मंडराया संकट

झाबुआ :  ग्रामीण क्षेत्रों में अंतिम संस्कार जैसी महत्वपूर्ण और संवेदनशील व्यवस्था को सम्मानजनक बनाने के उद्देश्य से शासन द्वारा लाखों रुपये खर्च कर श्मशान घाटों पर टीनशेड एवं अन्य सुविधाओं का निर्माण कराया गया था। लेकिन झाबुआ जिले के अधिकांश ग्राम पंचायतों में इन निर्माण कार्यों की वास्तविकता अब सामने आने लगी है।

श्मशान घाटों पर लगे टीन शैड उड़ गए

क्षेत्र के अनेक श्मशान घाटों पर लगाए गए टीनशेड पूरी तरह उड़ चुके हैं, कई स्थानों पर चद्दरें जमीन पर बिखरी पड़ी हैं तो कहीं पूरी संरचना क्षतिग्रस्त हो चुकी है। हालत यह है कि जिन स्थानों को अंतिम संस्कार के लिए सुरक्षित और व्यवस्थित बनाया जाना था, वे स्वयं बदहाली और अव्यवस्था के प्रतीक बन गए हैं।

आखिर बारिश के मौसम में मुर्दे कहां जलाए जाएं?

ग्रामीणो का कहना है कि श्मशान घाट कोई सामान्य निर्माण कार्य नहीं है। यह वह स्थान है जहां हर व्यक्ति की अंतिम यात्रा समाप्त होती है। ऐसे में यदि श्मशान घाटों की ही यह स्थिति है तो बरसात के मौसम में अंतिम संस्कार कैसे होंगे? जब टीनशेड ही नहीं बचेंगे तो परिजन अपने स्वजनों का अंतिम संस्कार किस प्रकार करेंगे?

अधिकांश पंचायतों में एक जैसी स्थिति

जानकारी के अनुसार पेटलावद तहसील की करीब समस्त पंचायतों और गांवों में बने श्मशान घाटों की स्थिति कमोबेश एक जैसी है। कहीं चद्दरें उड़ गई हैं तो कहीं निर्माण कार्य क्षतिग्रस्त हो चुका है। इससे निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।

लाखों खर्च हुए, लेकिन टिक नहीं पाए निर्माण

ग्रामीणों का आरोप है कि शासन द्वारा खर्च की गई राशि का वास्तविक लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल रहा है। यदि निर्माण कार्य गुणवत्तापूर्ण हुए होते तो इतनी जल्दी यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती। लोगों का कहना है कि संबंधित विभागों और जिम्मेदार एजेंसियों की जवाबदेही तय होना चाहिए।

प्रशासन करे तकनीकी जांच

ग्रामीणों ने मांग की है कि जिले के वरिष्ठ अधिकारी स्वयं मौके पर पहुंचकर निरीक्षण करें तथा सभी पंचायतों में बने श्मशान घाटों की तकनीकी जांच कराई जाए। साथ ही जिन निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की कमी पाई जाए, वहां दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करते हुए तत्काल मरम्मत और पुनर्निर्माण कराया जाए।

बड़ा सवाल

जब शासन ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है, तब आखिर ऐसी कौन सी लापरवाही हुई कि श्मशान घाट जैसी महत्वपूर्ण और संवेदनशील व्यवस्था के टीनशेड ही उड़ गए? क्या निर्माण कार्य केवल कागजों तक सीमित रह गए थे?

प्रशासन से अपेक्षा

जिला कलेक्टर, जनपद पंचायत एवं संबंधित विभागों को इस गंभीर विषय पर तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। क्योंकि श्मशान घाट केवल एक निर्माण नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की अंतिम यात्रा से जुड़ी गरिमा, सम्मान और संवेदनशीलता का प्रतीक है। इसकी बदहाली ग्रामीणों की पीड़ा और व्यवस्था की कमजोरी दोनों को उजागर कर रही है। ग्रामीणों का सवाल श्मशान घाटों की उड़ गई चद्दरें, करोड़ों की योजनाओं पर उठे सवाल, आखिर बरसात में मुर्दे कहां जलाए जाएं ?

रिपोर्टर : मनीष कुमट

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