सप्ताह में दो दिन की व्यवस्था, क्या पूरे सप्ताह का इलाज संभव?

मंडला - जिले के निवास क्षेत्र के ग्राम हीरापुर में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सामने आए मामले ने अब कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए है। हीरापुर उप स्वास्थ्य केंद्र में लंबे समय तक ताला लगा रहने और परिसर के बाहर एक्सपायरी दवाएं खुले में मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने कार्रवाई तो की है, लेकिन सवाल अब भी कायम हैं कि आखिर इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार कौन है? मामले में बीएमओ निवास द्वारा संबंधित एमपीडब्ल्यू का पांच दिन का वेतन रोकने के आदेश जारी किए गए हैं। साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं को सुचारु रखने के लिए सप्ताह में दो दिन एएनएम और दो दिन चिकित्सक की ड्यूटी लगाई गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सप्ताह में दो दिन की व्यवस्था से पूरे सप्ताह की स्वास्थ्य जरूरतें पूरी हो पाएंगी? स्कूल के पास पड़ी थीं एक्सपायरी दवाएं, बच्चों की सुरक्षा पर सवाल- इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिस स्थान पर समाप्त अवधि की दवाएं पड़ी मिलीं, उसके पास ही स्कूल संचालित है। यहां से प्रतिदिन बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे और ग्रामीण गुजरते हैं। खुले में पड़ी अनुपयोगी दवाएं बच्चों की पहुंच में होना स्वास्थ्य और सुरक्षा दोनों के लिहाज से चिंता का विषय है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि ये दवाएं समय पर हटाई नहीं गईं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी थी? क्या स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था इतनी कमजोर है कि स्कूल जैसे संवेदनशील स्थान के सामने पड़ी दवाएं भी समय पर अधिकारियों की नजर में नहीं आईं?

मॉनिटरिंग व्यवस्था पर उठे सवाल- स्वास्थ्य विभाग द्वारा लगातार स्वास्थ्य केंद्रों की मॉनिटरिंग किए जाने की बात कही जाती है। लेकिन हीरापुर की स्थिति इस दावे पर सवाल खड़े करती है। यदि नियमित निरीक्षण हो रहे थे तो उप स्वास्थ्य केंद्र के संचालन में कमी, दवाओं के रखरखाव और एक्सपायरी दवाओं के निस्तारण में हुई चूक सामने क्यों नहीं आई?
दवाओं का एक्सपायर होना यह संकेत देता है कि दवा स्टॉक की निगरानी और जरूरतमंद मरीजों तक दवाएं पहुंचाने की व्यवस्था में कहीं न कहीं कमी रही। ऐसे में केवल एक कर्मचारी पर कार्रवाई कर देना क्या पर्याप्त है या फिर पूरी व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है?

लापरवाही किसकी? कर्मचारी या मॉनिटरिंग सिस्टम की कमी?-

मामले में विजय पेगवार बीएमओ निवास का कहना है कि एक्सपायरी दवाओं की जानकारी एमपीडब्ल्यू के संज्ञान में नहीं थी। इसके बावजूद उसका पांच दिन का वेतन रोकने के आदेश जारी किए गए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब कर्मचारी को इसकी जानकारी नहीं थी, तो उस पर कार्रवाई का आधार क्या रहा? वहीं यदि  निगरानी व्यवस्था में कमी का है, तो इस व्यवस्था के लिए जिम्मेदार अन्य स्तरों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।

सप्ताह में दो दिन की व्यवस्था, क्या पूरे सप्ताह का इलाज संभव?-

स्वास्थ्य सुविधा सुधारने के लिए सप्ताह में दो दिन एएनएम और दो दिन चिकित्सक की ड्यूटी लगाई गई है। यह कदम तत्काल राहत देने वाला हो सकता है, लेकिन ग्रामीणों का सवाल है कि बाकी दिनों में मरीज कहां जाएंगे? हीरापुर जैसे दूरस्थ क्षेत्र में, जहां लोगों को पहले ही 10 से 12 किलोमीटर दूर इलाज के लिए जाना पड़ता है, वहां नियमित स्वास्थ्य सुविधा की आवश्यकता है। केवल कुछ दिनों की व्यवस्था से ग्रामीणों की स्वास्थ्य समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं दिखता।

जिम्मेदार कौन?-

हीरापुर उप स्वास्थ्य केंद्र का मामला केवल एक कर्मचारी के वेतन रोकने तक सीमित नहीं होना चाहिए। असली सवाल यह है कि— एक्सपायरी दवाएं खुले में कैसे पहुंचीं? स्कूल के सामने पड़ी दवाओं की जानकारी समय पर क्यों नहीं हुई?
स्वास्थ्य केंद्र की नियमित मॉनिटरिंग कौन कर रहा था? दवाओं के रखरखाव और निस्तारण की जिम्मेदारी किसकी थी?
क्या केवल एक कर्मचारी पर कार्रवाई से व्यवस्था सुधर जाएगी? स्वास्थ्य विभाग ने कार्रवाई की शुरुआत जरूर की है, लेकिन अब जरूरत इस बात की है कि पूरी व्यवस्था की समीक्षा हो, ताकि भविष्य में किसी गांव में स्वास्थ्य सेवा ताले में बंद न मिले और बच्चों की सुरक्षा पर सवाल खड़े न हों।

रिपोर्टर - ऋषभ गुप्ता 

 

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