अमित शाह और पीएम मोदी जैसी थी सोनिया और मनमोहन की सियासी केमिस्ट्री
कभी आपने सोचा है कि राजनीति की दुनिया में दो बड़े नेता, जिनकी राजनीति और सोच में अंतर हो सकता है, फिर भी एक-दूसरे के साथ अच्छे तालमेल में कैसे काम कर सकते हैं? खासकर तब जब उनके रास्ते और प्राथमिकताएं अलग-अलग हों। यही है वो रहस्य, जिसे हम आज आपको बताएंगे—मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के बीच की सियासी केमिस्ट्री। यह कहानी सिर्फ एक पार्टी या एक सरकार की नहीं, बल्कि उस अद्भुत समझदारी की है, जिसने कांग्रेस पार्टी और यूपीए सरकार को एक दशक तक चलाया।
2004 में जब कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव जीतने के बाद सत्ता में वापसी की, तो यह मान लिया गया था कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनेंगी। मगर, राजनीति के इस खेल में कुछ ऐसा घटित हुआ कि पूरा देश हैरान रह गया। सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया और पार्टी के भीतर एक नई राजनीति का जन्म हुआ। इस मोड़ पर, मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया गया, लेकिन क्या यह कदम सिर्फ एक शह और मात का खेल था? क्या सोनिया गांधी की सत्ता पर छाया इतनी गहरी थी कि प्रधानमंत्री बनने के बाद भी मनमोहन सिंह को अपनी सरकार को रिमोट से चलाने का आरोप झेलना पड़ा?
इस सब के बीच, सोनिया और मनमोहन के बीच की सियासी केमिस्ट्री का एक दिलचस्प पहलू देखने को मिला .. दोनों ने राजनीति में कभी टकराव की स्थिति नहीं आने दी। चाहे वह यूपीए सरकार के अहम फैसलों का मुद्दा हो या संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाने का प्रयास—इन दोनों के बीच हर कदम पर समझदारी का संगम दिखाई देता है।
यूपीए सरकार के दौरान सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच राजनीतिक तालमेल ऐसा था कि कोई भी राजनीतिक तूफान उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं कर पाया। हालांकि कई बार ऐसी स्थितियाँ आईं जब उनके विचार मेल नहीं खाते थे। एक उदाहरण 2006 में सामने आया जब पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कटौती को लेकर मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के बीच मतभेद थे। वहीं, परमाणु समझौते के मामले में भी वामपंथी दलों का विरोध था, लेकिन सोनिया और मनमोहन की समझदारी ने इस संकट को भी सुलझा लिया।
कभी मनमोहन सिंह का विश्वास पूरी तरह से सोनिया गांधी के नेतृत्व में था, तो कभी सोनिया ने मनमोहन को पूरी स्वतंत्रता दी, जिससे वह अपने फैसले खुद ले सकें। फिर भी एक सवाल आज भी पूछा जाता है कि वाकई ये सरकार रिमोट कंट्रोल की सरकार थी .....क्या वाकई पूर्व प्रधानमत्री डॉ मनमोहन सोनिया गांधी के इशारों पर काम करते थे ..दरसल एनएसी के माध्यम से सोनिया गांधी ने कई अहम नीतियों का मार्गदर्शन किया, जैसे मनरेगा और खाद्य सुरक्षा कानून। हालांकि, इस दौरान मनमोहन सिंह को रिमोट से चलने वाली सरकार का आरोप सहना पड़ा..कई फैसले जरूर उन्होंने सोनिया गांधी के दबाव में जरूर लिए ..
वहीं , यूपीए के पहले कार्यकाल में परमाणु करार, खाद्य सुरक्षा बिल, और मनरेगा जैसे बड़े मुद्दों पर सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच कभी सहमति तो कभी मतभेद थे। एक उदाहरण 2008 में परमाणु करार के दौरान आया जब वामपंथी दलों ने इसका विरोध किया। मनमोहन सिंह ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था और कोई समझौता करने को तैयार नहीं थे। इसके बावजूद सोनिया गांधी ने अपनी रणनीति से उन्हें समझाया और वह सरकार के खिलाफ खड़े हुए वाम दलों से मुकाबला करने में सफल रहे।
वहीं , 2013 में जब राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के एक अहम अध्यादेश को मीडिया के सामने फाड़ दिया, तो ये वाकया काफी सुर्खियों में आया। मनमोहन सिंह, जो उस समय विदेश यात्रा पर थे, ने यह घटना सुनी और उन्हें गहरा धक्का लगा। फिर भी उन्होंने अपने संयम से इस मुद्दे को सार्वजनिक नहीं होने दिया और अपने रिश्तों को गांधी परिवार से बनाए रखा। आखिरकार, कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने के बाद भी, मनमोहन सिंह ने पार्टी और गांधी परिवार के साथ अपने रिश्ते को बरकरार रखा। उनकी सियासी सूझबूझ और गांधी परिवार के प्रति निष्ठा ने उन्हें कभी झुकने नहीं दिया। वह भारतीय राजनीति में सबसे मजबूत विकेट बने रहे, और मोदी सरकार के कार्यकाल में भी अपनी आवाज उठाते रहे।
देखा जाए तो यह कहानी सिर्फ दो नेताओं के रिश्ते की नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के एक ऐतिहासिक अध्याय की है, जिसमें सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने अपने-अपने विचार और कार्यशैली के बावजूद एक ऐसी समझदारी दिखायी, जिसने न सिर्फ पार्टी को मजबूती दी, बल्कि पूरे देश को एक नई दिशा भी दी।
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