आंकड़ों की हरियाली नहीं; दौंड को चाहिए देसी पेड़ों की मजबूत ‘हरित ढाल’

दौंड : हर साल मानसून शुरू होते ही दौंड शहर और तालुका क्षेत्र में पौधारोपण की होड़ शुरू हो जाती है। सरकारी कार्यालय, ग्राम पंचायतें, स्कूल-कॉलेज, सामाजिक संस्थाएं और विभिन्न संगठन सैकड़ों-हजारों पौधे लगाते हैं। पौधारोपण की तस्वीरें प्रकाशित होती हैं और लगाए गए पौधों के आंकड़े भी घोषित किए जाते हैं। लेकिन अगली गर्मी समाप्त होने तक इनमें से वास्तव में कितने पेड़ जीवित बचे, इसका सार्वजनिक हिसाब शायद ही सामने आता है।

अब सवाल ‘कितने पौधे लगाए?’ से अधिक ‘कितने पेड़ बचाए और विकसित किए?’ का होना चाहिए।
कम और अनिश्चित वर्षा, भीषण गर्मी, पानी की सीमित उपलब्धता, भूजल पर बढ़ता दबाव और तेजी से हो रहे शहरीकरण को देखते हुए दौंड में केवल बड़ी संख्या में पौधे लगाना पर्याप्त नहीं होगा। स्थानीय जलवायु के अनुकूल देसी प्रजातियों का चयन, सही स्थान, पेड़ों के बीच पर्याप्त दूरी और कम से कम तीन वर्षों तक उनका संरक्षण जरूरी है।
‘एक पेड़ मां के नाम’ को संरक्षण से जोड़ना होगा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 जून 2024 को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य मां के सम्मान में पौधा लगाकर प्रत्येक नागरिक को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ना है।
दौंड में इस अभियान की सफलता केवल लगाए गए पौधों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। ‘मां के नाम लगाया पेड़ जीवित रखने की जिम्मेदारी भी मेरी’, यह भावना नागरिकों में विकसित होगी तभी अभियान वास्तविक जनआंदोलन बन सकेगा।
दौंड को देसी पेड़ ही क्यों चाहिए?
दौंड, बारामती और इंदापुर का क्षेत्र पुणे जिले के अपेक्षाकृत गर्म और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में शामिल है। इसलिए अधिक पानी मांगने वाली अथवा केवल सजावटी प्रजातियों के बजाय स्थानीय परिस्थितियों में टिकने वाली देसी प्रजातियों को प्राथमिकता देना जरूरी है।
नीम, करंज, बबूल और पलाश जैसी प्रजातियों पर शुष्क क्षेत्रों में उपयुक्त स्थानों के लिए विचार किया जा सकता है। इमली लंबी आयु और घनी छाया देने वाला पेड़ है, इसलिए पर्याप्त खुली जगहों पर इसका रोपण उपयोगी हो सकता है।
भीमा नदी किनारे, नहरों, नालों तथा अपेक्षाकृत अधिक नमी वाली जमीन पर अर्जुन और जामुन लगाए जा सकते हैं। बरगद और पीपल जैसे विशाल वृक्षों के लिए बड़े सार्वजनिक मैदान, मंदिर परिसर, शिक्षण संस्थाओं के विस्तृत परिसर अथवा नदी किनारे की उपयुक्त जगहों को प्राथमिकता दी जा सकती है।
हर सड़क पर एक ही प्रजाति लगाने की जिद क्यों?
पौधारोपण से पहले स्थान का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है। शहर की संकरी सड़क और गांव के बाहर की खुली सड़क के लिए एक जैसी वृक्ष योजना नहीं बनाई जा सकती।
बिजली की लाइन कहां से गुजरती है? भूमिगत जल और सीवेज पाइपलाइन कहां हैं? फुटपाथ कितना चौड़ा है? बड़ा होने के बाद पेड़ वाहन चालकों की दृश्यता में बाधा तो नहीं बनेगा? उसकी जड़ें और शाखाएं कितनी फैलेंगी? इन सभी पहलुओं का अध्ययन करने के बाद ही स्थान और प्रजाति तय की जानी चाहिए।
विशेष रूप से बरगद और पीपल जैसे बड़े पेड़ संकरे फुटपाथ, इमारतों के बेहद करीब अथवा बिजली की तारों के नीचे लगाने से बचना चाहिए।
पेड़ों के बीच दूरी का भी विज्ञान
कम दूरी पर अधिक पौधे लगाकर आज पौधारोपण का बड़ा आंकड़ा दिखाया जा सकता है, लेकिन दस-पंद्रह वर्षों बाद उन्हीं पेड़ों की जड़ों और शाखाओं के बीच जगह के लिए संघर्ष हो सकता है।
सामान्य योजना के तहत नीम के बीच 6 से 8 मीटर, करंज 5 से 7 मीटर, अर्जुन 6 से 8 मीटर, जामुन 7 से 9 मीटर, इमली 8 से 10 मीटर, पीपल 8 से 12 मीटर और बरगद के बीच 10 से 15 मीटर अथवा उससे अधिक दूरी पर विचार किया जा सकता है।
हालांकि इसे अंतिम वैज्ञानिक मानक नहीं माना जाना चाहिए। मिट्टी, उपलब्ध स्थान, सड़क की चौड़ाई और पूर्ण विकसित पेड़ के संभावित विस्तार को देखते हुए वन एवं उद्यान विशेषज्ञों की सलाह जरूरी है।
पौधा लगा दिया यानी जिम्मेदारी खत्म नहीं!
दौंड जैसे कम वर्षा वाले क्षेत्र में पौधा लगाने के बाद उसकी पहली और दूसरी गर्मी सबसे महत्वपूर्ण होती है। पौधे के आसपास पानी रोकने की व्यवस्था, मल्चिंग, आवश्यकतानुसार सिंचाई तथा पशुओं से सुरक्षा के उपाय जरूरी हैं।
इसलिए पौधारोपण के बजट को केवल ‘पौधा खरीदना + गड्ढा खोदना’ तक सीमित नहीं रखना चाहिए। प्रत्येक पौधे के कम से कम अगले तीन वर्षों के रखरखाव और संरक्षण के लिए अलग आर्थिक प्रावधान होना चाहिए।
देशी वृक्षों का संरक्षण समय की जरूरत : म्हस्के
“दौंड शहर में पर्यावरण और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए देसी वृक्षों का रोपण और संरक्षण बेहद जरूरी है। नीम, इमली, करंज और पीपल जैसे वृक्ष अच्छी छाया देते हैं। पशु-पक्षियों को आश्रय भी इन्हीं वृक्षों से मिलता है। इसलिए देसी वृक्षों के बीजों का संरक्षण, उनका रोपण और लगाए गए वृक्षों की देखभाल आज समय की जरूरत बन गई है।”
— दीपक मच्छिंद्र म्हस्के, सहायक परियोजना अधिकारी, दौंड नगर परिषद
81 ग्राम पंचायतों का बने ‘ग्रीन रिपोर्ट कार्ड’
दौंड तालुका की 81 ग्राम पंचायतें यदि हर वर्ष अपने क्षेत्र में हुए पौधारोपण और जीवित बचे पेड़ों का सार्वजनिक लेखा-जोखा प्रस्तुत करें तो पर्यावरण के नाम पर वास्तव में कितना काम हुआ, इसकी स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकती है।
प्रत्येक ग्राम पंचायत को कुल लगाए गए पौधे, देसी प्रजातियों की संख्या, प्रजातिवार आंकड़े, जियो-टैगिंग, एक वर्ष बाद जीवित पौधे और तीन वर्ष बाद जीवित पेड़ों का रिकॉर्ड रखना चाहिए।
इसके आधार पर प्रत्येक ग्राम पंचायत का ‘ट्री सर्वाइवल रेट’ तय किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, एक हजार पौधे लगाकर केवल 400 बचाने वाली ग्राम पंचायत की तुलना में 500 पौधे लगाकर 450 पेड़ जीवित रखने वाली ग्राम पंचायत पर्यावरण संरक्षण में अधिक सफल मानी जाएगी।
सबसे अधिक पौधे लगाने वाली नहीं, बल्कि सबसे अधिक प्रतिशत में देसी पेड़ जीवित रखने वाली ग्राम पंचायत को ‘हरित ग्राम पंचायत’ के रूप में सम्मानित किया जाना चाहिए।
हर पेड़ को मिले एक ‘पालक’
ग्राम पंचायतों, स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं को ‘एक व्यक्ति-एक पेड़-तीन वर्ष जिम्मेदारी’ की अवधारणा अपनानी चाहिए।
पौधा किसके नाम पर लगाया गया, उसका नंबर क्या है, प्रजाति कौन-सी है, वह कहां लगाया गया है और उसकी देखभाल की जिम्मेदारी किसकी है—इसका रिकॉर्ड रखा जा सकता है।
स्कूली विद्यार्थियों को पेड़ गोद दिए जाएं तो पर्यावरण शिक्षा को प्रत्यक्ष सामाजिक जिम्मेदारी से भी जोड़ा जा सकेगा।
दौंड का बने ‘ग्रीन मैप’
दौंड नगर परिषद और तालुका की ग्राम पंचायतों को मिलकर ‘दौंड देसी वृक्ष हरित योजना’ तैयार करने की जरूरत है।
शहर की प्रमुख सड़कें, भीमा नदी किनारा, कुरकुंभ औद्योगिक क्षेत्र के आसपास की उपयुक्त सार्वजनिक भूमि, पाटस और गोपालवाड़ी क्षेत्र, गांवों को जोड़ने वाली सड़कें, स्कूल परिसर, श्मशान भूमि और सार्वजनिक चरागाह जैसी जगहों का सर्वेक्षण कर पौधारोपण योग्य स्थानों की मैपिंग की जा सकती है।
किस स्थान पर कौन-सा पेड़ लगेगा, दो पेड़ों के बीच कितनी दूरी होगी, सिंचाई के लिए पानी कहां से आएगा और संरक्षण की जिम्मेदारी किसकी होगी—इन सभी बातों को दर्ज करने वाला ‘ग्रीन मैप’ तैयार किया जाए तो दौंड की वृक्ष योजना को वैज्ञानिक और दीर्घकालीन दिशा मिल सकती है।
दौंड प्रशासन से पांच सवाल
1. पिछले तीन वर्षों में कितने पौधे लगाए गए और आज उनमें से कितने जीवित हैं?
2. कुल पौधारोपण में देसी प्रजातियों का प्रतिशत कितना है?
3. लगाए गए पौधों की जियो-टैगिंग और ‘सर्वाइवल ऑडिट’ हुआ है क्या?
4. पौधों के तीन वर्षों के संरक्षण के लिए अलग निधि उपलब्ध है क्या?
5. दौंड तालुका में सर्वाधिक प्रतिशत में देसी पेड़ जीवित रखने वाली ग्राम पंचायत कौन-सी है?
दौंड का ‘हरित पंचसूत्र’
देसी प्रजातियां • सही स्थान और दूरी • हर पेड़ को पालक • कम से कम तीन वर्ष संरक्षण • वार्षिक सर्वाइवल ऑडिट
पेड़ों के बीच प्रस्तावित सामान्य दूरी
नीम : 6–8 मीटर | करंज : 5–7 मीटर | अर्जुन : 6–8 मीटर | जामुन : 7–9 मीटर | इमली : 8–10 मीटर | पीपल : 8–12 मीटर | बरगद : 10–15 मीटर या अधिक
वास्तविक पौधारोपण से पहले स्थान, मिट्टी, पानी की उपलब्धता, सड़क की चौड़ाई, बिजली की लाइन और पूर्ण विकसित पेड़ के फैलाव को देखते हुए विशेषज्ञों से दूरी तय कराना आवश्यक है।
आखिरी सवाल...
पौधारोपण के लिए कितने गड्ढे खोदे गए, इसका हिसाब प्रशासन के पास होगा; लेकिन उन गड्ढों में लगाए गए पौधों में से आज कितने पेड़ बनकर खड़े हैं, क्या इसका भी कोई हिसाब है?
दौंड को कागजों पर दर्ज लाखों पौधों की हरियाली नहीं चाहिए।
दौंड को चाहिए ऐसी जीवित ‘देसी वृक्षों की हरित ढाल’, जो तपती दोपहर में राहगीर को छाया दे, पक्षियों को अपना घर दे, प्रदूषण के बीच शहर को राहत दे और आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा तथा सांस लेने का अधिकार दे।

संवाददाता : प्रमोद दत्तात्रय काकडे 

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