दिल्ली की राजनीति में फिर से उथल-पुथल: क्या मायावती का हाथी लौटेगा?
दिल्ली की सियासी धरती पर एक वक्त था, जब बसपा का हाथी बिलकुल वैसा ही मजबूत था जैसे दिल्ली के किले की दीवारें—दृढ़, शख्त, और उसे हर किसी की नजरों में अपनी छाप छोड़ने की आदत थी। सोचिए, उस समय अगर कोई कहता कि मायावती की पार्टी दिल्ली में ऐसे गुम हो जाएगी, जैसे धुंआ हवाओं में उड़ जाता है, तो शायद कोई भी यकीन नहीं करता।लेकिन वक्त ने करवट ली, और बसपा का हाथी दिल्ली की राजनीति से धीरे-धीरे गायब हो गया, जैसे पुराने जमाने की कोई कहानी। तो चलिए, आपको बताते हैं कैसे मायावती की पार्टी दिल्ली के चुनावी मैदान में "टॉप प्लेयर" से "गुमनाम खिलाड़ी" बन गई।
2008: दिल्ली में हाथी की पहली 'धमाकेदार एंट्री'
2008 में, दिल्ली विधानसभा चुनावों में जब बसपा ने अपनी पूरी ताकत झोंकी, तो ऐसा लगा कि दिल्ली की राजनीति में बसपा की चोटी पर चढ़ाई होने वाली है।14.05% वोट और 2 सीटों के साथ बसपा ने हर किसी को चौंका दिया।
गोकलपुर और बदरपुर जैसी सीटों पर जीत के बाद यह साबित हो गया कि हाथी ने यहां अपनी जड़ें जमा ली थीं।
हर तरफ यही चर्चा थी कि "आखिर मायावती ने दिल्ली में घुसने का रास्ता कैसे खोला?" बसपा का नाम अचानक से दिल्ली की राजनीति में हॉट टॉपिक बन गया था। लेकिन फिर आया साल 2013 और 2015 .... जैसे-जैसे बसपा का वोट प्रतिशत गिरने लगा, दिल्ली के सियासी खेल में उसका असर धुंधला पड़ने लगा
ऐसे में चलिए बताते हैं कि आखिर कैसे धीरे धीरे मायावती दिल्ली में हीरों से जीरों हो गईं
- BSP को 2008 में छतरपुर सीट पर 25,492 वोट मिले थे....
- वहीं , 2020 में महज 369 वोट मिले थे
- बल्लीमारान सीट पर 2020 में 167 वोट ही मिले, इसी सीट पर 2008 में 10,331 वोट मिले थे
- 23.72% वोट के साथ तीसरे नंबर थी घोंडा सीट पर 2008 में, 2020 में चुनाव ही नहीं लड़ा
- 33,830 वोट मिले थे नरेला सीट 2008 में, 821 वोट मिले 2020 में
- 136 वोट ही जुटा पाए बहनजी की पार्टी के प्रत्याशी पिछले चुनाव में नई दिल्ली सीट पर
फिलहाल अब जब एक बार फिर दिल्ली में चुनाव होने जा रहा है तो एक सवाल फिर से उठ रहा है कि -
क्या मायावती का ‘हाथी’ दिल्ली में फिर से उबरेगा?
क्या बसपा किसी 'किंगमेकर' की भूमिका में वापसी कर सकती है?
दिल्ली के राजनीतिक दृष्य में बसपा का वापसी करना इतना आसान नहीं होगा, लेकिन राजनीति में हर पल कुछ भी हो सकता है..वैसे मायावती की रणनीति की बात करें तो आने वाले दिनों में पार्टी मायावती की रैलियां आयोजित करने की योजना बना रही है। बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की प्रमुख मायावती ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया। उन्होंने यह दावा किया कि अगर EVM में कोई गड़बड़ी और धांधली नहीं हुई तो बीएसपी बेहतर प्रदर्शन करेगी।पार्टी के चुनावी प्रचार का नेतृत्व उनके भतीजे आकाश आनंद कर रहे हैं, जिन्होंने चुनाव मैदान में बीएसपी के पदाधिकारियों का उत्साहवर्धन किया। इसके अलावा, मायावती ने बीएसपी के मूवमेंट का सफरनामा ‘भाग 20’ भी जारी किया, जिसमें पार्टी की कार्ययोजना और आगामी योजनाओं के बारे में विस्तार से बताया गया है
कुल मिलाकर देखा जाए तो राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। दिल्ली की जनता का मूड पल-पल बदल सकता है, और यही वो शक्ति है जो हर सियासी समीकरण को उलट सकती है। अगर बसपा अपने सशक्त नेतृत्व और रणनीति को फिर से सही दिशा में मोड़ पाती है, तो दिल्ली की राजनीति में कोई भी शक्ति उसे नकार नहीं सकती। लेकिन अगर ऐसा न हुआ, तो हाथी हमेशा के लिए दिल्ली की सियासत के इतिहास का हिस्सा बन जाएगा।सिर्फ वक्त ही बताएगा कि दिल्ली की धरती पर बसपा का 'हाथी' फिर से उठेगा या नहीं!
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