जच्चा-बच्चा की मौत के बाद डॉ. सोनल अग्रवाल पर मेहरबानी क्यों?

रीवा :  रीवा जिले के श्याम शाह मेडिकल कॉलेज के संजय गांधी अस्पताल में जच्चा-बच्चा की मौत का मामला अब अस्पताल की चिकित्सकीय व्यवस्था से निकलकर जवाबदेही और कार्रवाई के कथित दोहरे मापदंड तक पहुंच गया है। परिजनों के गंभीर आरोपों के बाद सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि यदि ड्यूटी पर तैनात वरिष्ठ चिकित्सक की मौजूदगी और भूमिका को लेकर सवाल हैं, तो कार्रवाई का शिकंजा सबसे पहले निचले स्तर के कर्मचारियों पर ही क्यों कसा जा रहा है?

परिजनों के मुताबिक, कल्पना मिश्रा को प्रसव के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था। ऑपरेशन के बाद महिला और नवजात दोनों की मौत हो गई। घटना के बाद परिजनों ने चिकित्सकीय लापरवाही का आरोप लगाते हुए जमकर हंगामा किया और जिम्मेदार डॉक्टरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की।
ड्यूटी पर कौन था, ऑपरेशन के समय वरिष्ठ डॉक्टर कहां थीं?
मामले में डॉ. सोनल अग्रवाल की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। परिजनों का आरोप है कि ड्यूटी पर होने के बावजूद वे अस्पताल में मौजूद नहीं थीं और ऑपरेशन के दौरान मरीज को अपेक्षित वरिष्ठ चिकित्सकीय निगरानी नहीं मिल सकी।
यह आरोप बेहद गंभीर है। हालांकि डॉ. सोनल अग्रवाल के अस्पताल से अनुपस्थित रहने और निजी अस्पताल में सेवाएं देने के आरोप की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है। ऐसे में अब अस्पताल प्रबंधन के लिए ड्यूटी रोस्टर, बायोमेट्रिक/अटेंडेंस रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और ऑपरेशन से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक जांच के दायरे में लाना जरूरी हो गया है।
चार घंटे हंगामा... फिर बंद कमरे में बैठक!
जच्चा-बच्चा की मौत के बाद अस्पताल परिसर में घंटों तक हंगामा चलता रहा। परिजन जिम्मेदार चिकित्सकों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग पर अड़े रहे। इसके बाद डीन, अधीक्षक और स्थानीय विधायक की मौजूदगी में बैठक होने की बात सामने आई।
लेकिन बैठक के बाद उठे कदमों ने ही पूरे मामले को और विवादित बना दिया।
आरोप है कि दो नर्सों को कार्रवाई के घेरे में लाने की तैयारी की गई, जबकि वरिष्ठ चिकित्सक की भूमिका को लेकर जांच कमेटी गठित कर मामला आगे बढ़ा दिया गया।
यही वह बिंदु है जहां अस्पताल प्रबंधन की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
डॉक्टरों पर जांच,नर्सों पर कार्रवाई—क्यों?
यदि मरीज की मौत में चिकित्सकीय लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी ड्यूटी पर मौजूद हर स्तर के जिम्मेदार व्यक्ति की भूमिका की जांच के बाद तय होनी चाहिए। लेकिन यदि एक ही घटना में निचले स्तर के कर्मचारियों पर तत्काल कार्रवाई और वरिष्ठ चिकित्सकों पर केवल जांच की प्रक्रिया अपनाई जाती है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे कि क्या कार्रवाई का पैमाना पद के हिसाब से अलग-अलग है?
क्या मेडिकल कॉलेज में जवाबदेही भी पद देखकर तय होती है?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जच्चा और नवजात की मौत कोई सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि ऐसी घटना है जिसमें प्रत्येक स्तर की जिम्मेदारी की निष्पक्ष पड़ताल जरूरी है।
रिकॉर्ड में फेरबदल के आरोप, जांच में सीसीटीवी से लेकर केस शीट तक खंगालने की मांग
परिजनों की ओर से घटना के बाद अस्पताल के दस्तावेजों और फाइलों में कथित फेरबदल के आरोप भी लगाए गए हैं। फिलहाल इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि ऐसा हुआ है तो मामला बेहद गंभीर हो सकता है।
ऐसे में जांच सिर्फ कागजी कार्रवाई तक सीमित रखने के बजाय—

- ड्यूटी रोस्टर,
- बायोमेट्रिक/अटेंडेंस रिकॉर्ड,
- सीसीटीवी फुटेज,
- ऑपरेशन नोट्स,
- केस शीट,
- दवाओं और उपचार का रिकॉर्ड,
- पीजी डॉक्टरों की ड्यूटी,
- वरिष्ठ चिकित्सक की उपलब्धता,
- तथा मौत से पहले और बाद में तैयार किए गए दस्तावेज

की स्वतंत्र जांच की जरूरत है।

दिसंबर की घटना का भी उठ रहा हवाला
डॉ. सोनल अग्रवाल की भूमिका को लेकर सवाल उठाने वाले लोग दिसंबर माह में गायनी विभाग की ओटी में आग लगने और नवजात की मौत से जुड़े पुराने मामले का भी हवाला दे रहे हैं। उस घटना की परिस्थितियों और उसमें तय की गई जिम्मेदारी की भी स्वतंत्र समीक्षा किए जाने की मांग उठ रही है।
हालांकि पुराने मामले और वर्तमान घटना के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध की पुष्टि जांच के बिना नहीं की जा सकती, लेकिन लगातार सामने आ रहे सवालों के मद्देनजर मेडिकल कॉलेज प्रशासन की कार्यप्रणाली और जवाबदेही व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की मांग जरूर तेज हो गई है।
अब जांच कमेटी नहीं, जवाब चाहिए!
मेडिकल कॉलेज प्रबंधन के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जांच के नाम पर खानापूर्ति होगी या वास्तव में जिम्मेदारी तय की जाएगी?
ड्यूटी पर कौन था?
ऑपरेशन के समय वरिष्ठ डॉक्टर कहां थीं?
ऑपरेशन किसकी निगरानी में हुआ?
पीजी डॉक्टरों के साथ वरिष्ठ चिकित्सक मौजूद थीं या नहीं?
ड्यूटी रोस्टर और सीसीटीवी में क्या सामने आया?
मौत के बाद केस रिकॉर्ड सुरक्षित रखा गया या उसमें कोई बदलाव हुआ?
यदि वरिष्ठ चिकित्सक की कोई गलती नहीं थी तो उन्हें क्लीन चिट किस आधार पर मिलेगी?
और यदि लापरवाही सामने आती है तो क्या उनके खिलाफ भी वही कार्रवाई होगी जो नर्सों के खिलाफ की जा रही है?
इन सवालों का जवाब सिर्फ जांच कमेटी बनाकर नहीं दिया जा सकता। जवाब दस्तावेजों, रिकॉर्ड और निष्पक्ष कार्रवाई से देना होगा।
पद देखकर नहीं,सबूत देखकर हो कार्रवाई
जच्चा और नवजात की मौत के बाद किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति को केवल इसलिए बचाया नहीं जाना चाहिए क्योंकि वह वरिष्ठ पद पर है। वहीं किसी नर्स या निचले स्तर के कर्मचारी को केवल इसलिए बलि का बकरा नहीं बनाया जाना चाहिए कि उसके खिलाफ कार्रवाई करना आसान है।
अगर लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी ऊपर से नीचे तक तय होनी चाहिए।
मेडिकल कॉलेज प्रबंधन को यह स्पष्ट करना होगा कि मामले की जांच वास्तव में निष्पक्ष है या फिर कार्रवाई का पूरा भार निचले स्तर के कर्मचारियों पर डालकर वरिष्ठ चिकित्सकों को बचाने की कोशिश की जा रही है।
जच्चा-बच्चा की मौत का सच किसी बंद कमरे की बैठक में नहीं, बल्कि रिकॉर्ड और निष्पक्ष जांच में सामने आना चाहिए।
अब निगाहें मेडिकल कॉलेज प्रबंधन पर हैं—क्या जिम्मेदारों पर समान कार्रवाई होगी या फिर एक बार फिर निचले स्तर के कर्मचारियों को आगे कर पूरे मामले पर पर्दा डाल दिया जाएगा?

रिपोर्टर : अर्जुन तिवारी 

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