जच्चा-बच्चा की मौत पर गरजी आवाज,संजय गांधी अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्था पर पार्षद ओम त्रिपाठी के तीखे सवाल
रीवा : विंध्य क्षेत्र के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल संजय गांधी अस्पताल में जच्चा-बच्चा की मौत का मामला अब महज एक चिकित्सकीय घटना नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही पर बड़ा सवाल बनता जा रहा है। इस मामले को लेकर गुढ़ नगर परिषद के पार्षद एवं युवा नेता ओम त्रिपाठी ने अस्पताल प्रबंधन और स्वास्थ्य व्यवस्था पर तीखा हमला बोलते हुए कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ओम त्रिपाठी ने कहा कि जिस परिवार के घर में बच्चे की किलकारी गूंजने वाली थी, वहां कुछ ही घंटों में मातम पसर गया। उन्होंने भावुक लेकिन आक्रामक अंदाज में सवाल उठाया कि क्या कल्पना ने कभी सोचा होगा कि जिस दिन वह अपने बच्चे को जन्म देने वाली थी, उसी दिन उसकी जिंदगी ही खत्म हो जाएगी?
बताया जा रहा है कि ऑपरेशन थिएटर ले जाते समय कल्पना डरी हुई थी। पिता ने बेटी को हिम्मत देते हुए कहा था—“कुछ नहीं होगा बेटी,मैं हूं ना...” लेकिन अस्पताल के दरवाजे तक बेटी का साथ देने वाला पिता अपनी बेटी और नवजात को वापस नहीं पा सका।
कार्रवाई हुई,लेकिन सवाल अभी जिंदा हैं
मामले में प्रथम दृष्टया कार्रवाई करते हुए ड्यूटी पर तैनात दो नर्सों के निलंबन और जांच समिति गठित किए जाने की बात सामने आई है। अधिकारियों की ओर से जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषियों पर नियमानुसार कार्रवाई का भरोसा भी दिया गया है।
लेकिन ओम त्रिपाठी का सवाल है—“कार्रवाई अपनी जगह है, लेकिन क्या इससे कल्पना और उसके बच्चे की जिंदगी वापस आ सकती है?”
उन्होंने कहा कि हर गंभीर घटना के बाद जांच समिति गठित करना और कुछ कर्मचारियों पर कार्रवाई करना स्थायी समाधान नहीं हो सकता। असली सवाल यह है कि ऐसी लापरवाही या अव्यवस्था की स्थिति पैदा ही क्यों होती है?
यदि अस्पताल में मरीजों की सुरक्षा के लिए मजबूत निगरानी तंत्र, पर्याप्त स्टाफ, समयबद्ध उपचार और जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था है, तो बार-बार ऐसे सवाल क्यों खड़े हो रहे हैं?
संजय गांधी अस्पताल पर बढ़ता भरोसा या बढ़ता डर?
ओम त्रिपाठी ने कहा कि संजय गांधी अस्पताल सिर्फ एक सरकारी भवन नहीं है। यह पूरे विंध्य क्षेत्र की लाखों गरीब और मध्यमवर्गीय जनता की उम्मीद है। जिन लोगों के पास महंगे निजी अस्पतालों में इलाज कराने की क्षमता नहीं है, उनके लिए यही अस्पताल आखिरी सहारा है।
ऐसे में यदि मरीज और उनके परिजन अस्पताल में इलाज कराने से पहले ही भयभीत होने लगें, तो यह स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर चेतावनी है।
उन्होंने सवाल किया कि क्या सरकारी अस्पताल में बेहतर इलाज पाने के लिए भी किसी राजनीतिक रसूख या प्रभावशाली व्यक्ति की सिफारिश जरूरी हो गई है? यदि आम आदमी को अपने अधिकार के रूप में मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधा के लिए किसी रसूखदार व्यक्ति का सहारा लेना पड़े, तो फिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला से सीधा हस्तक्षेप की मांग
ओम त्रिपाठी ने रीवा विधायक एवं प्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला से मामले में गंभीरता से हस्तक्षेप करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि संजय गांधी अस्पताल की व्यवस्था केवल रीवा का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे विंध्य की जनता से जुड़ा सवाल है।
उन्होंने मांग उठाई कि सिर्फ इस घटना की जांच तक मामला सीमित न रखा जाए, बल्कि अस्पताल की पूरी व्यवस्था का व्यापक मूल्यांकन कराया जाए। ड्यूटी व्यवस्था, चिकित्सकीय निगरानी, नर्सिंग स्टाफ की उपलब्धता, आपातकालीन सेवाओं, मरीजों की शिकायतों और जवाबदेही की पूरी प्रणाली की समीक्षा होनी चाहिए।
जनता को जांच नहीं, जवाब चाहिए
ओम त्रिपाठी ने कहा कि अब जनता केवल जांच समिति और कार्रवाई की घोषणाएं नहीं सुनना चाहती। जनता जानना चाहती है कि—
- अस्पताल में मरीजों की सुरक्षा की स्थायी व्यवस्था कब मजबूत होगी?
- गंभीर मामलों में तत्काल चिकित्सकीय निर्णय और उपचार सुनिश्चित करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
- लापरवाही की जिम्मेदारी तय करने का तंत्र कब मजबूत होगा?
- हर घटना के बाद जांच के बजाय घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं?
- और सबसे बड़ा सवाल—क्या न्याय और बेहतर इलाज पाने के लिए किसी परिवार को पहले अपना सदस्य खोना जरूरी है?
अब कागजी कार्रवाई नहीं,व्यवस्था में बदलाव चाहिए
संजय गांधी अस्पताल को विंध्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। ऐसे में यहां होने वाली गंभीर घटनाओं और सामने आने वाली शिकायतों को केवल कागजी जांच तक सीमित करना समस्या का समाधान नहीं है।
ओम त्रिपाठी ने कहा कि यदि वास्तव में व्यवस्था सुधारनी है तो जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ सिस्टम की उन खामियों को भी चिन्हित करना होगा, जिनके कारण मरीजों की जिंदगी खतरे में पड़ती है।
कल्पना और उसके नवजात की मौत का दर्द उनके परिवार के लिए शायद कभी खत्म नहीं होगा। लेकिन इस दर्द से एक बड़ा सबक जरूर निकलना चाहिए—संजय गांधी अस्पताल की व्यवस्था ऐसी बने कि यहां इलाज के लिए आने वाला गरीब और आम आदमी डर लेकर नहीं, भरोसा लेकर पहुंचे।
रिपोर्टर : अर्जुन तिवारी
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