दीयों की रोशनी पर सियासी सवाल,जनता की जिंदगी कब रोशन होगी?
रीवा : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर मध्यप्रदेश समेत देशभर में आयोजित भव्य दीपोत्सव अब सियासी सवालों के घेरे में भी आ गया है। दीपों की जगमगाहट के बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव शिव सिंह ने सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को लेकर सरकार पर तीखा निशाना साधते हुए पूछा है कि जनता के पैसे से जलाए गए दीपक क्या जनता की जिंदगी में भी कोई स्थायी उजाला लेकर आएंगे?
शिव सिंह ने कहा कि दीप जलाना भारतीय परंपरा में शुभता, खुशहाली और मंगलकामना का प्रतीक है, लेकिन लोकतंत्र में जनता को यह पूछने का अधिकार है कि इतने बड़े आयोजन पर सार्वजनिक धन से कितना खर्च हुआ और उस खर्च की प्राथमिकता क्या थी।
उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश में बड़े पैमाने पर दीप प्रज्ज्वलन कार्यक्रम आयोजित किया गया। उज्जैन सहित प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में दीप जलाए गए और ग्राम पंचायतों से लेकर नगरीय निकायों तक आयोजन को जोड़ा गया। उनके मुताबिक दीपों के अलावा तेल, दीये, बाती, परिवहन, सजावट, व्यवस्था और मानव संसाधन समेत आयोजन से जुड़े कई मदों में खर्च हुआ होगा। उन्होंने सरकार से मांग की कि पूरे आयोजन की वास्तविक लागत और मदवार खर्च का सार्वजनिक ब्यौरा सामने रखा जाए।
‘हर रुपये का हिसाब मांगना जनता का अधिकार’
शिव सिंह ने कहा कि देश का आम आदमी आज अपनी आय का एक-एक रुपया सोच-समझकर खर्च करता है। किसी परिवार का युवा रोजगार की तलाश में है, किसान खेती की बढ़ती लागत से जूझ रहा है, छोटा व्यापारी बाजार की चुनौतियों से परेशान है और गरीब परिवार इलाज तथा बच्चों की पढ़ाई के खर्च के बीच संतुलन बनाने को मजबूर है।
ऐसे में सवाल यह है कि सार्वजनिक धन की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?
उन्होंने कहा कि यदि किसी आयोजन के खर्च में कटौती की गुंजाइश हो तो उसी संसाधन का इस्तेमाल अस्पतालों में आधुनिक उपकरण,सरकारी स्कूलों की सुविधाओं,युवाओं के कौशल प्रशिक्षण,छोटे उद्योगों को सहायता,पेयजल,सड़क और रोजगार पैदा करने वाली परियोजनाओं में किया जा सकता है।
‘एक दीया कुछ घंटे, रोजगार पूरी जिंदगी’
सपा नेता ने कहा कि एक दीपक कुछ घंटों तक रोशनी देता है, लेकिन एक रोजगार पूरे परिवार की जिंदगी बदल सकता है। एक आयोजन की सजावट और रोशनी कुछ समय बाद समाप्त हो जाती है, जबकि अच्छा अस्पताल, मजबूत स्कूल, बेहतर सड़क, स्वच्छ पेयजल और रोजगार की सुविधा वर्षों तक जनता के काम आती है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर दीपोत्सव सुंदर दृश्य पैदा कर सकता है, लेकिन किसी सरकार की उपलब्धि का वास्तविक असर तब दिखाई देता है जब बेरोजगार युवा को रोजगार, गरीब को बेहतर इलाज, बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और किसान को राहत मिलती है।
शिव सिंह के 5 सीधे सवाल
1. दीपोत्सव पर सार्वजनिक धन से कुल कितना खर्च हुआ?
2. तेल, दीये, बाती, परिवहन, सजावट और अन्य व्यवस्थाओं पर कितनी राशि खर्च की गई?
3. क्या आयोजन का मदवार खर्च जनता के सामने सार्वजनिक किया जाएगा?
4. सार्वजनिक धन की प्राथमिकता तय करने के लिए सरकार के पास क्या स्पष्ट पैमाना है?
5. क्या इसी राशि का कोई हिस्सा अस्पताल, स्कूल, रोजगार, पेयजल और जनसुविधाओं पर खर्च किया जा सकता था?
‘सरकारी खजाना किसी सरकार की निजी तिजोरी नहीं’
शिव सिंह ने कहा कि सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन सरकारी खजाना जनता के योगदान से बनता है। इसलिए सार्वजनिक धन के इस्तेमाल पर सवाल उठाना किसी आयोजन की धार्मिक या सांस्कृतिक भावना का विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का सवाल है।
उन्होंने कहा कि “असली उजाला उस दिन होगा, जब बेरोजगार युवा के हाथ में रोजगार होगा, गरीब परिवार को बेहतर इलाज मिलेगा, बच्चे को अच्छी शिक्षा मिलेगी, किसान की लागत घटेगी और छोटे व्यापारी को कारोबार बढ़ाने का अवसर मिलेगा।”
शिव सिंह ने कहा कि दीपोत्सव की रोशनी कुछ घंटे चमक सकती है,लेकिन सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जनता के पैसे से खर्च किया गया प्रत्येक रुपया जनता के जीवन में लंबे समय तक असर डालने वाला उजाला पैदा करे।
रिपोर्टर : अर्जुन तिवारी
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