सहसवान में 3 चुनाव, 3 बार सपा की जीत! 2027 में किसकी होगी जीत?
उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले की सहसवान विधानसभा सीट (संख्या 113) समाजवादी पार्टी का एक ऐसा गढ़ बन चुकी है, जहां सेंध लगाना किसी भी विरोधी दल के लिए लोहे के चने चबाने जैसा रहा है! साल 2012 से लेकर 2022 तक, यानी लगातार तीन विधानसभा चुनावों में इस सीट पर सिर्फ और सिर्फ साइकिल की गूंज सुनाई दी है। आइए, सहसवान के इस सियासी किले का पूरा इतिहास खंगालते हैं।
साल 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता ओमकार सिंह ने मैदान में ताल ठोकी और विरोधी खेमे में खलबली मचा दी। ओमकार सिंह ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 72,946 वोट बटोरे और जीत का परचम लहराया।
मुकाबला आसान नहीं था-बसपा के मीर हादी अली उर्फ बाबर मियां ने 65,919 वोट हासिल कर कड़ी टक्कर दी और दूसरे स्थान पर रहे। इसके अलावा, राष्ट्रीय परिवर्तन दल के कद्दावर नेता धर्मपाल यादव उर्फ डी.पी. यादव 56,243 वोट लेकर तीसरे पायदान पर रहे। आखिरकार, ओमकार सिंह ने 7,027 वोटों के अंतर से बाजी अपने नाम कर ली। उस साल इस क्षेत्र में मतदान का आंकड़ा 62.48% दर्ज किया गया था।
साल 2017 में जब पूरे उत्तर प्रदेश में राजनीतिक हवाएं बदल रही थीं, तब भी सहसवान की जनता ने सपा पर ही अपना भरोसा बनाए रखा। हालांकि, इस बार मुकाबला पिछले चुनाव से भी ज्यादा कांटे का और रोमांचक था। सपा के टिकट पर उतरे ओमकार सिंह को 77,543 वोट मिले, जबकि बसपा के अरशद अली ने 73,274 वोट पाकर उन्हें चारों खाने चित्त करने की पूरी कोशिश की। हार-जीत का अंतर सिमटकर महज 4,269 वोटों पर आ गया, लेकिन ओमकार सिंह ने सूझबूझ दिखाते हुए लगातार दूसरी बार इस सीट पर कब्जा बरकरार रखा। इस चुनाव में मतदान प्रतिशत गिरकर 60.43% पर आ गया था।
साल 2022 के महासंग्राम में समाजवादी पार्टी ने रणनीति बदलते हुए अपना उम्मीदवार बदला और मैदान में उतारे ब्रजेश यादव। जनता ने नए चेहरे पर भी भरपूर प्यार लुटाया और ब्रजेश यादव ने 83,673 वोट हासिल कर सपा के विजय रथ को रुकने नहीं दिया। बसपा के मुसर्रत अली 69,728 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे, जबकि भाजपा के धीरेंद्र कुमार भारद्वाज 66,616 वोट लेकर तीसरे नंबर पर रहे। ब्रजेश यादव ने 13,945 वोटों के शानदार अंतर से जीत दर्ज कर यह साबित कर दिया कि सहसवान में साइकिल की पकड़ कितनी मजबूत है। हालांकि, इस बार वोटिंग प्रतिशत थोड़ा और लुढ़ककर 58.98% पर पहुंच गया, जो राजनीतिक विश्लेषकों के लिए एक बड़ा सवाल है कि आखिर मतदाता कम क्यों हो रहे हैं। सहसवान का यह सियासी रणक्षेत्र सिर्फ हालिया दशकों का नहीं है, बल्कि इसका इतिहास बहुत पुराना और दिलचस्प रहा है। साल 2012 से पहले भी यहां दिग्गजों ने अपनी किस्मत आजमाई है:
1957: निर्दलीय उम्मीदवार उल्फत सिंह ने यहां जीत का श्रीगणेश किया।
1962: भारतीय जनसंघ के टिकट पर उल्फत सिंह दोबारा जीते।
1967: भारतीय जनसंघ के अशर्फी लाल विजयी हुए।
1969 और 1974: भारतीय क्रांति दल की शांति देवी ने लगातार दो बार शानदार जीत दर्ज की।
1977: जनता पार्टी के नरेश पाल सिंह यादव ने बाजी मारी।
1980: कांग्रेस (इंदिरा) के मीर मजहर अली जीते।
1985: लोकदल से नरेश पाल सिंह यादव फिर विधानसभा पहुंचे।
1989: निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मीर मजहर अली उर्फ नन्हे मियां ने जीत हासिल की।
1991: जनता दल के टिकट पर ओमकार सिंह विजयी हुए।
1993 और 1996: पहले मीर मजहर अली उर्फ नन्हे मियां और फिर दिग्गज नेता मुलायम सिंह यादव ने सपा के टिकट पर यहां से झंडा गाड़ा।
2002: सपा के ओमकार सिंह यादव ने फिर जीत दर्ज की।
2007: राष्ट्रीय परिवर्तन दल के धर्मपाल यादव उर्फ डी.पी. यादव ने ओमकार सिंह को महज 109 वोटों के बेहद रोमांचक और मामूली अंतर से हराकर सबको चौंका दिया था।
सहसवान की पिच पर पिछले तीन चुनावों से लगातार समाजवादी पार्टी का दबदबा रहा है। ओमकार सिंह से लेकर ब्रजेश यादव तक, पार्टी ने हर बार अपना परचम लहराया है। लेकिन राजनीति में कल क्या हो, कोई नहीं जानता। आने वाले 2027 के विधानसभा चुनाव में हवा किस करवट बैठेगी, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगा कि मैदान में ताल ठोकने वाले उम्मीदवार कौन होंगे, जनता के बीच के स्थानीय मुद्दे क्या रंग लाएंगे, पार्टियों का प्रचार अभियान कितना असरदार होगा और सबसे बढ़कर मतदाता मतदान केंद्र तक पहुंचकर क्या फैसला सुनाते हैं। सहसवान का यह सियासी दंगल आने वाले दिनों में और भी ज्यादा दिलचस्प होने वाला है!

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