10वीं मुहर्रम को रोजा रखें और कुरान की तिलावत करें - मो इजहारूल हक
शिवहर - मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है और इसे इस्लाम में सबसे पवित्र महीनों में से एक माना जाता है। यह त्योहार मुख्य रूप से पैगंबर मुहम्मद के नवासे (पोते) हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद में मनाया जाता है,जिन्होंने अन्याय और अत्याचार के खिलाफ अपने प्राणों की आहुति दी थी। पूर्व सांसद मोहम्मद अनवारूल हक के छोटे भाई पूर्व जिला परिषद सदस्य मोहम्मद इजहारूल हक ने मोहर्रम को रोजा रखने और कुरान की तिलावत करने की नसीहत दी है। पूर्व जिला परिषद सदस्य मोहम्मद इजहारूल हक ने बताया कि मोहर्रम की शुरुआत पैगंबर मुहम्मद के मक्का से मदीना प्रवास (हिजरत) से होती है,जो इस्लामी कैलेंडर का पहला वर्ष भी है। मोहर्रम के महीने के दसवें दिन (आशूरा) को इराक के कर्बला में एक ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। इसमें पैगंबर के पोते हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 अनुयायियों ने अत्याचारी शासक यजीद की सेना के खिलाफ लड़ते हुए शहादत प्राप्त की थी।
उन्होंने कहा कि मोहर्रम मनाने के तरीके विभिन्न मुस्लिम समुदायों में अलग-अलग होते हैं, शिया मुसलमान इस महीने के पहले दस दिनों तक इमाम हुसैन की शहादत का शोक मनाते हैं। वे काले कपड़े पहनते हैं, ताजिया निकालते हैं और कर्बला की घटनाओं को याद करके मातम मनाते हैं। सुन्नी मुसलमान मोहर्रम के 9वें और 10वें दिन (या केवल 10वें दिन) रोज़ा (उपवास) रखते हैं। इसे बहुत पुण्य का कार्य माना जाता है। मो हक ने बताया कि मोहर्रम के दसवें दिन (आशूरा) को केवल इमाम हुसैन की शहादत ही नहीं, बल्कि पैगंबर मूसा (मूसा अलैहिस्सलाम) द्वारा फिरौन के अत्याचारों से अपने अनुयायियों को बचाने और समुद्र पार करने की ऐतिहासिक घटना से भी जोड़ा जाता है।मोहर्रम का पर्व हमें सच्चाई,न्याय और इंसानियत के रास्ते पर चलने और अन्याय के आगे न झुकने की सीख देता है।
रिपोर्टर - संजय गुप्ता
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