राम कथा के चतुर्थ दिवस में केवट प्रसंग, राम वन गमन एवं दशरथ स्वर्गवास का भावपूर्ण वर्णन

सिवनी मालवा - राम मानव जीवन के वास्तविक आधार है राम कथा इस जीवन को जीने की कला सिखाती है जिस जीवन को भगवान राम ने इस पृथ्वी पर जन्म लेकर मनुष्य को यह बताने की कोशिश करी की आदर्श मर्यादा चरित्रवान अपने वचन पर कायम रहना और अपने बुजुर्गों के आदेश का पालन करना ऐसी बहुत सारी चीज आज मनुष्य को रामायण जी से सीखने को मिलती है! गीता चित्र मंदिर, मैं चल रही  होंडा तथा सोनालिका ट्रैक्टर शोरूम के संचालक एवं कथा के आयोजक दीपक पालीवाल द्वारा आयोजित राम कथा के चतुर्थ दिवस कथा मे  व्यास पंडित विद्याधर शर्मा ने भगवान श्रीराम के वन गमन, केवट प्रसंग, राजा दशरथ के स्वर्गवास एवं भरत के त्याग की कथा का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा व्यास पंडित विद्याधर शर्मा ने बताया कि माता कैकेयी के दो वरदानों के कारण भगवान श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास मिला। पिता की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए प्रभु श्रीराम ने सहर्ष वनवास स्कार किया। माता सीता और भाई लक्ष्मण भी उनके साथ वन के लिए प्रस्थान कर गए।

केवट प्रसंग का वर्णन करते हुए उन्होंने ने बताया कि जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण गंगा तट पर पहुंचे तो उन्हें नदी पार कराने के लिए केवट से नाव मांगी। केवट ने प्रभु के चरण पखारने की इच्छा व्यक्त की। भगवान श्रीराम ने उसकी भक्ति को स्वीकार किया। केवट ने श्रद्धा एवं प्रेम से प्रभु के चरण धोकर उन्हें नाव में बैठाया और गंगा पार कराया। कथा के इस प्रसंग ने श्रद्धालुओं को भक्ति, प्रेम, समर्पण और समानता का संदेश दिया। श्रीराम के वन गमन से अयोध्या नगरी शोक में डूब गई। पुत्र वियोग में राजा दशरथ अत्यंत व्यथित हो गए और अंततः श्रीराम का स्मरण करते हुए उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। इस प्रसंग का वर्णन सुनकर श्रद्धालु भावुक हो उठे। इसके पश्चात भरत के त्याग एवं भ्रातृ प्रेम का वर्णन करते हुए बताया गया कि भरत ने राजगद्दी स्वीकार करने से इनकार कर दिया और भगवान श्रीराम को वापस अयोध्या लाने के लिए वन की ओर प्रस्थान किया। श्रीराम के वापस न लौटने पर भरत ने उनकी चरण पादुकाओं को राजगद्दी पर स्थापित कर स्वयं उनके प्रतिनिधि के रूप में राज्य का संचालन किया। इस अवसर पर आयोजक दीपक पालीवाल सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कथा स्थल पर भक्तिमय वातावरण बना रहा। कथा के माध्यम से त्याग, मर्यादा, माता-पिता की आज्ञा, भक्ति, समर्पण, भाईचारे और कर्तव्यनिष्ठा का संदेश दिया गया।

रिपोर्टर - संतोष सिंह चंदेल

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