अब भारत के हाथ लगा ऊर्जा का सूरज!

दुनिया जब युद्ध, राजनीति और चुनावी शोर में उलझी रही, उसी वक्त भारत के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की, जिस पर आने वाले वर्षों में पूरी दुनिया की नजरें टिकी रह सकती हैं।तमिलनाडु के कल्पक्कम में स्थित परमाणु संयंत्र में देश का फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) “क्रिटिकल” हो गया है। सुनने में यह शब्द तकनीकी लगता है, लेकिन इसके पीछे कहानी बेहद दिलचस्प और दूरगामी है।

आसान भाषा में समझें तो यह वह क्षण है जब रिएक्टर ने अपने अंदर चल रही परमाणु प्रक्रिया को स्थिर तरीके से खुद बनाए रखने की क्षमता हासिल कर ली है। यानी अब यह सिर्फ प्रयोग नहीं, बल्कि असली ऊर्जा उत्पादन की दिशा में बढ़ चुका है।यह खबर इसलिए बड़ी है क्योंकि यह सिर्फ बिजली बनाने की तकनीक नहीं, बल्कि बिजली के “भविष्य” को बदलने की कोशिश है।

अब तक दुनिया के अधिकतर परमाणु रिएक्टर यूरेनियम पर चलते हैं। यूरेनियम से बिजली बनती है, लेकिन समस्या यह है कि यह संसाधन सीमित है और भारत में इसकी उपलब्धता भी बहुत कम है।भारत को लंबे समय से यूरेनियम के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। यही वजह है कि परमाणु ऊर्जा का विस्तार हमेशा सीमित गति से आगे बढ़ता रहा है।लेकिन इसी सिस्टम के अंदर एक और संभावना छिपी थी। जब यूरेनियम से बिजली बनती है, तो उसका एक हिस्सा प्लूटोनियम के रूप में बचता है। इसे आमतौर पर कचरा माना जाता है, लेकिन यही कचरा आगे चलकर ईंधन भी बन सकता है।

यहीं से “ब्रीडर रिएक्टर” की अवधारणा पैदा होती है।

कचरे से ईंधन, और ईंधन से और ईंधन

फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की सबसे खास बात यही है कि यह साधारण रिएक्टरों की तरह सिर्फ ऊर्जा नहीं निकालता, बल्कि नया ईंधन भी तैयार करता है।कल्पना कीजिए एक ऐसी प्रणाली की जिसमें यूरेनियम से जो प्लूटोनियम बनता है, वही दोबारा ईंधन बन जाता है। फिर उससे बिजली बनती है, और फिर और ईंधन तैयार होता रहता है।

यह एक ऐसा चक्र है जिसमें संसाधन खत्म होने के बजाय लंबे समय तक चलता रहता है।इसी वजह से इसे परमाणु तकनीक की सबसे उन्नत अवधारणाओं में से एक माना जाता है। कल्पक्कम का PFBR क्यों महत्वपूर्ण है

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