झारखंड के पंचपरगनिया में मनसा पूजा की अद्भुत परंपरा

जब सावन की हरियाली विदा लेने लगती है और भादो की पहली बूंदें धरती को चूमती हैं, तब झारखंड के मुरहू, अड़की और बूण्डु की वादियों में एक अनोखी हलचल शुरू हो जाती है। यह कोई साधारण त्योहार नहीं, बल्कि एक रहस्य और रोमांच से भरपूर ऐसा आयोजन होता है जिसमें जहरीले सांप बन जाते हैं श्रद्धा के प्रतीक और आस्था की डोर से जुड़ जाता है जीवन और मृत्यु का गहरा संबंध। जी हां..हम बात कर रहे हैं , एक ऐसी रहस्यमई पूजा के बारे में जिसको जानने के बाद आप आपके होश उड़ जाएंगे ... 

ऐसा पर्व जहां इंसान और सांप बन जाते है दोस्त
जहां आस्था का सैलाब करता है चमत्कार 
जहां विश बन जाता है वरदान 
यह है अनोखी और रहस्यमई मनसा पूजा  

इन दिनों मुरहू के गनालोया, अड़की और पंचपरगनिया बूण्डु के हर गांव में सजी होती है एक अनोखी झांकी। हाथों में पिटारे, सिर पर श्रद्धा और कंधों पर लिपटे नाग-नागिन! बड़े ही गर्व से युवक, महिलाएं और बच्चे अपने शरीर पर सांपों को लपेटे घूमते हैं। कोई सांप को गले का हार बना रहा है, तो कोई मुंह के अंदर डालकर दिखा रहा है साहस का प्रदर्शन। ऐसा लगता है जैसे मौत को भी इस आस्था ने वश में कर लिया हो!

इस पर्व के पीछे सिर्फ साहस नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी एक दिव्य परंपरा है। मान्यता है कि मनसा पूजा के दौरान उच्चारित किए जाने वाले विशेष मंत्र और पहाड़ी जड़ी-बूटियों की शक्ति से सर्पदंश भी निष्क्रिय हो जाता है।कहा जाता है कि यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि श्रद्धा और संस्कृति की गहराई का परिचायक है।

भादो के महीने में चारों ओर से जहरीले सांपों को मंत्रों के सहारे एकत्र किया जाता है। फिर बंगाल या स्थानीय कारीगरों से बनवायी जाती है एक सुंदर सी मनसा देवी की प्रतिमा, जिसमें देवी के साथ उनका वाहन – नाग भी होता है। पूरे गांव में उत्सव का वातावरण, ढोल-नगाड़ों की गूंज और भक्तों की भीड़ – सब मिलकर रचते हैं एक अलौकिक दृश्य।इस पर्व में आस्था का जो चरम रूप देखने को मिलता है, वो किसी युद्धभूमि से कम नहीं। कई भक्तगण अपने गालों, छाती और पेट में लोहे के त्रिशूल और तार को आर-पार कर देते हैं – और दावा करते हैं कि मां मनसा की कृपा से उन्हें कुछ नहीं होता। यह दृश्य देखकर रोंगटे खड़े हो जाएं, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह भक्ति का सबसे सशक्त प्रमाण है।

पूजा के बाद सभी सांपों को आदरपूर्वक जंगल में छोड़ दिया जाता है। कोई डर नहीं, कोई हिंसा नहीं – बस मंत्रोच्चारण के साथ उन्हें विदा किया जाता है। पंचपरगनिया इलाके में यह परंपरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत बन चुकी है। गहमन, चिपी, नाग-नागिन, अजगर – सभी को दोस्त समझकर पूजा जाता है।

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